34 साल बाद बदली भारत की शिक्षा नीति: जानिए हर पहलू, सरल शब्दों में

सरकार ने शिक्षा नीति के इन बदलावों को बुनियादी स्तर पर 4 हिस्सों में बाँटा है। पहले और दूसरे हिस्से में प्राथमिक और उच्च शिक्षा का ब्यौरा है। तीसरे हिस्से में भाषा, संस्कृति और तकनीक पर विस्तार से चर्चा की गई है। चौथे हिस्से में इस बात का ज़िक्र है कि कैसे सभी को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले और नई नीति लागू कैसे की जाए।


केंद्र सरकार ने बीते दिन लगभग 34 साल बाद भारत की शिक्षा नीति में बदलाव किया। कई बदलाव ऐसे हैं, जिन्हें वाकई पढ़ा और समझा जाना चाहिए। सरकार ने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि देश को वैश्विक स्तर पर मुखिया बनाने के दौर में शिक्षा नीति की भूमिका सबसे अहम होगी। 

चाहे सामाजिक न्याय और समानता हो या अर्थव्यवस्था, विज्ञान और प्रौद्योगिकी या देश की एकता, शिक्षा की भूमिका लगभग हर क्षेत्र में अहम है। सरकार ने इन सारी बातों को मद्देनज़र रखते हुए शिक्षा नीति में बड़े पैमाने पर बदलाव किए हैं।  

सरकार ने शिक्षा नीति के इन बदलावों को बुनियादी स्तर पर 4 हिस्सों में बाँटा है। पहले और दूसरे हिस्से में प्राथमिक और उच्च शिक्षा का ब्यौरा है। तीसरे हिस्से में भाषा, संस्कृति और तकनीक पर विस्तार से चर्चा की गई है। चौथे हिस्से में इस बात का ज़िक्र है कि कैसे सभी को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले और नई नीति लागू कैसे की जाए।  

स्कूली शिक्षा

हमारे देश की शुरुआती पढ़ाई का ढाँचा 10+2 पर आधारित था। इसके हिसाब से एक बच्चा 6 साल की उम्र में पहली कक्षा में पहुँचता है। यानी 3 से 6 साल की उम्र के बीच उसका शिक्षा से कोई सरोकार नहीं रहता है। नए बदलाव के हिसाब से इसे 5+3+3+4 कर दिया गया है। और इसका नाम रखा गया है  Early Childhood Care and Education (ECCE), यानी 3 साल की उम्र से ही बच्चों की पढ़ाई शुरू होगी। 

शुरुआती उम्र से तैयार किए जाएँगे बच्चे 

सरकार ने ऐसा करने के पीछे उल्लेखनीय कारण दिया है।  सरकार का कहना है एक बच्चे के दिमाग का 85 फ़ीसदी विकास 6 साल की उम्र के पहले हो जाता है। ऐसे में यह बेहद ज़रूरी है कि वह पहली कक्षा में जाने के पहले विद्यालय (स्कूल) के लिए पूरी तरह तैयार रहे। बच्चों को बेहतर भाषा और अक्षर ज्ञान कराने के लिए अलग-अलग तरह के खेल और क्रियाकलापों का हिस्सा बनाया जाएगा। 

एनसीइआरटी (NCERT) दो हिस्सों में बच्चों के लिए पाठ्यक्रम तैयार करेगी। पहला 0-3 साल तक की उम्र के बच्चों के लिए और दूसरा 3-8 तक की उम्र के बच्चों के लिए। इसके अलावा प्राथमिक शिक्षा को आँगनबाड़ी से भी जोड़ा जाएगा। साथ ही आँगनबाड़ी को बहुत मज़बूती प्रदान की जाएगी। 

कक्षा 1 से पहले बच्चों को “Preparatory Class” यानी “बालवाटिका” में भेजा जाएगा। इसमें पढ़ाने वाले शिक्षक का ज़ोर बच्चों को स्कूली शिक्षा के लिए तैयार करना होगा। इसके पहले आँगनबाड़ी में काम करने वाले शिक्षकों और कर्मचारियों को एनसीइआरटी के नीति-निर्देशों के आधार पर तैयार किया जाएगा। आदिवासी इलाकों के लिए ECCE के लिए “आश्रमशाला” बनाई जाएगी और इसमें भी ऊपर दी गई जानकारी के आधार पर काम होगा।  

30 बच्चों पर 1 शिक्षक का लक्ष्य

सरकार के मुताबिक़ देश के 5 करोड़ बच्चे ऐसे हैं जिन्हें अंकों का सही ज्ञान नहीं है। सरकार का ज़ोर इस बात पर होगा कि वह जोड़, घटाव, गुणा और भाग करना सीखें। सरकार इस योजना पर चल रही है कि साल 2025 तक बच्चों को संख्याओं और अंकों की सही समझ हो जाए। इसके लिए बच्चों को कक्षा 3 तक अच्छे से अंकों की पढ़ाई करवाई जाएगी। 

इसके अलावा पर्याप्त संख्या में शिक्षकों की बहाली की जाएगी। छात्र-शिक्षक अनुपात (PTR) 30:1 रखा जाएगा, यानी 30 बच्चों पर एक शिक्षक। वहीं आर्थिक और समाजिक रूप से कमज़ोर बच्चों के लिए यह अनुपात 25:1 रखा जाएगा। इसके लिए सरकार एक राष्ट्रीय स्तर का पोर्टल भी संचालित करेगी, Digital Infrastructure for Knowledge Sharing (DIKSHA)। बच्चों के पोषण (Nutrition) और मानसिक स्वास्थ्य (Mental Health) का ख़ास ध्यान रखा जाएगा।  

जिससे बच्चों की पढ़ाई बीच में न छूटे 

सरकार इस बात पर भी विशेष ध्यान देगी कि ज़्यादा से ज़्यादा संख्या में बच्चे विद्यालयों में दाख़िला लें और शिक्षा हासिल करें। कक्षा 6 से 8 तक के बच्चों की पढ़ाई का सकल नामांकन अनुपात Gross Enrollment Ratio (GER) 90.9 % था। यानी 90.9 % बच्चे अपनी पढ़ाई पूरी करते हैं लेकिन आगे की पढ़ाई में ऐसा नहीं है।

कक्षा 9 से 10 और 11 से 12 तक यह अनुआत सिर्फ 79.3% और 56.5% है। सरकार इस लक्ष्य पर काम कर रही है कि साल 2035 तक 12वीं तक के बच्चों की पढ़ाई का GER 100% हो जाए। इसके लिए सामाजिक और आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग के बच्चों के लिए National Institute of Open Schooling (NIOS) के तहत Open and Distance Learning (ODL) भी शुरू की जाएगी। साथ ही साथ पढ़ाई जारी रखने के लिए उनको बढ़ावा देने के लिए पूर्व छात्रों और स्थानीय समुदाय के लोगों की मदद भी ली जाएगी।   

किस उम्र में कितने दर्जे में होगा बच्चा 

इस नीति से बच्चों की शुरुआती पढ़ाई का पूरा ढाँचा बदला जाएगा। इसे कक्षा और आयु वर्ग के हिसाब से बदला जाएगा। यह कुछ इस तरह होगा, 3-8 साल, 8-11 साल, 11-14 साल और 14-18 साल। 5+3+3+4 कुछ इस तरह होगा, 

  • Foundational Stage: कुल 3 साल का प्री-स्कूल और कक्षा 1-2 की पढ़ाई 3 से 8 साल की उम्र तक
  • Preparatory Stage: 8 से 11 साल उम्र तक कक्षा 3 से 5 तक की पढ़ाई
  • Middle School Stage: 11 से 14 साल की उम्र तक कक्षा 6 से 8 तक की पढ़ाई
  • High School or Secondary Stage: कक्षा 9 से 12 की पढ़ाई कुल दो हिस्सों में, 9-10 पहले हिस्से में और 11-12 दूसरे हिस्से में

इसके अलावा अलावा ECCE पाठ्यक्रम में अच्छे व्यवहार, मान-सम्मान की भावना, नैतिकता, व्यक्तिगत और सार्वजनिक स्वच्छता और सहयोग की भावना से जुड़ी चीज़ें भी बताई जाएँगी।

बच्चों को बनाया जाएगा बहुभाषी  

  • प्रायोगिक तरीके से पढ़ाई और सीखने पर ज़ोर दिया जाएगा, उदाहरण- किस्सागोई।
  • पाठ्यक्रम के लगभग हर पहलू में कला को शामिल किया जाएगा।
  • खेल-कूद को बढ़ावा दिया जाएगा, इसे फिट इंडिया मूवमेंट के तहत पढ़ाई में शामिल किया जाएगा।
  • बच्चों की पढ़ाई में ह्यूमैनिटीज़ (मानव मूल्यों) को भी शामिल किया जाएगा।
  • कक्षा 5 तक बच्चों की पढ़ाई में मातृभाषा अनिवार्य होगी। ऐसा निजी और सार्वजनिक दोनों तरह के विद्यालयों में किया जाएगा।
  • इसके अलावा भाषा की पढ़ाई पर ज़ोर दिया जाएगा। जिससे बच्चे ज़्यादा भाषाओं में संवाद कर सकें।
  • किसी भी राज्य पर कोई भाषा थोपी नहीं जाएगी। बच्चों को 3 भाषाएँ पढ़ाने पर ज़ोर दिया जाएगा।
  • भाषाओं का चुनाव करने का अधिकार राज्य और बच्चों को दिया जाएगा।
  • एक भारत श्रेष्ठ भारत योजना के तहत ‘The Languages of India’ नाम की पहल शुरू की जाएगी। इसके तहत बच्चों को बताया जाएगा कि भारत की एकता का आधार भाषाएँ रही हैं।
  • बच्चों की पढ़ाई में संस्कृत भी अनिवार्य रूप से शामिल की जाएगी।
  • संस्कृत के अलावा तमिल, तेलुगू, कन्नड़, मलयाली, उड़िया, पर्शियन, प्राकृत और पाली भी (वैकल्पिक रूप से) शामिल की जाएगी।
  • रूसी, कोरियाई, जापानी, चीनी, जर्मन, फ्रांसीसी, स्पैनिश जैसी अंतर्राष्ट्रीय भाषा भी पढ़ाई में शामिल की जाएगी।
  • साथ ही सांकेतिक भाषा में बच्चों की पढ़ाई भी पाठ्यक्रम में शामिल की जाएगी। 

बदला जाएगा परीक्षा और मूल्यांकन का स्वरूप 

राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 के तहत एनसीईआरटी National Curricular Framework, NCF 2020 लागू करेगा। इसका हर 5 से 10 साल में मूल्यांकन किया जाएगा। आसान शब्दों में इसका लक्ष्य बच्चों से किताबों का भार कम करना होगा। साथ ही इसका लक्ष्य बच्चों में सीखने समझने का कौशल तैयार करना होगा। 

NCF के तहत बच्चों की परीक्षाओं का स्वरूप भी बड़े पैमाने पर बदला जाएगा। बोर्ड की परीक्षाओं में छात्रों को “बेस्ट ऑफ़ टू” असेसमेंट की सुविधा दी जाएगी। छात्रों के मूल्यांकन (असेसमेंट) के लिए National Assessment Centre बनाया जाएगा। इसका कार्य छात्रों की परीक्षाओं और मूल्यांकन के लिए दिशा-निर्देश तैयार करना होगा। इसे लागू करने में State Achievement Survey (SAS) और National Achievement Survey (NAS) बनाया जाएगा।

विद्यालयों में विषय और प्रोजेक्ट संबंधी समूह (क्लब/सर्कल) बनाए जाएँगे। इसमें विज्ञान, गणित, संगीत, शतरंज, कविता, भाषा, परिचर्चा के अलग -अलग सर्कल बनाए जाएंगे। यह बच्चों की पढ़ाई से पूरी तरह होगा।    

शिक्षकों के लिए भी होंगे तमाम नए अवसर  

नई शिक्षा नीति में शिक्षकों के लिए भी काफी कुछ नया है। 4 साल के बैचलर ऑफ़ एजुकेशन प्रोग्राम के लिए विशेष छात्रवृत्ति का प्रावधान किया गया है। इससे स्थानीय स्तर पर काफी संख्या में रोज़गार पैदा होगा, खासकर महिला शिक्षिकाओं के लिए। 

शिक्षकों का स्थानान्तरण भी विशेष परिस्थितियों में ही होगा। शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) को भी मज़बूत किया जाएगा। एक सुझाव के मुताबिक़ विद्यालयों को “स्कूल कॉम्प्लेक्स” बनाना चाहिए। इसके प्रबंधन के लिए स्थानीय लोगों को अभिवावकों की मदद ली जा सकती है। 

शिक्षकों के पास अपने तरीके से पाठ्यक्रम लागू करने का अधिकार होगा। शिक्षकों को ऑनलाइन मंच दिए जाएँगे, जहाँ वह अपने सुझाव साझा कर सकें। उन्हें एक साल में 50 घंटे का समय खुद पर काम करने के लिए मिलेगा।इस दौरान अच्छा प्रदर्शन करने वाले शिक्षकों को समय-समय पर प्रोन्नति भी मिलेगी।

साल 2022 के अंत तक National Professional Standards for Teachers (NPST) बनाई जाएगी। इसमें शिक्षकों के विकास प्रोन्नति से जुड़े दिशा-निर्देश मौजूद होंगे। दिव्यांग बच्चों के लिए अलग शिक्षक रखे जाएँगे, जिनका काम उन बच्चों के विकास पर ध्यान देना होगा। साल 2030 के अंत तक शिक्षकों को पढ़ाने के लिए 4 साल का बीएड अनिवार्य होगा।   

दिव्यांग, ट्रांसजेंडर और लड़कियाँ सभी को समान शिक्षा

सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग (SEDGs) से आने वाली आबादी को कई श्रेणी में बाँटा गया है। जिसमें मुख्य रूप से लैंगिक आधार पर (महिलाएँ और ट्रांसजेंडर), अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक को रखा गया है। इसके अलावा दिव्यांग, गरीबी रेखा से नीचे के लोग, तस्करी का शिकार हुए बच्चे, अनाथ और शोषित वर्ग से आने वाले बच्चे इन सभी के लिए सामान शिक्षा सुनिश्चित की जाएगी। 

जिन इलाकों में SEDGs श्रेणी के बच्चे ज़्यादा होंगे उन इलाकों को Special Education Zones घोषित कर दिया जाएगा। जवाहर नवोदय विद्यालय के तरह के विद्यालय तैयार किए जाएँगे जिसमें छात्रों को लगभग मुफ़्त सुविधाएँ मिलेंगी। इसमें लड़कियों और ट्रांसजेंडर की शिक्षा और सुरक्षा को मद्देनज़र रखते हुए छात्रावास तैयार किए जाएंगे। 

इसके अलावा दिव्यांग अधिकार क़ानून 2016 के तहत दिव्यांग बच्चों की शिक्षा सुनिश्चित कराने के लिए उचित कदम उठाए जाएँगे। दिव्यांग बच्चों को समान शिक्षा दिलाने के लिए शिक्षा पद्धति में उनके अनुसार बदलाव होंगे। SEDGs वर्ग के बच्चों के लिए कई छात्रवृत्ति योजना भी शुरू की जाएँगी।              

पढ़ाई में बढ़ाई जाएगी गवर्नेंस की भूमिका 

शिक्षा में गर्वनेंस को बढ़ावा देने के लिए इससे जुड़े अधिकारियों को अहम ज़िम्मेदारियाँ दी जाएगी। इसमें मुख्य रूप से ज़िला शिक्षा अधिकारी (DEO) और खंड शिक्षा अधिकारी (BEO) शामिल किए जाएँगे। यह विद्यालयों के कॉम्प्लेक्स/समूह के साथ मिल कर नीति-निर्देश लागू करेंगे। 

हर ज़िले या राज्य में “बाल भवन” का निर्माण कराया जाएगा जिसमें बच्चे हफ्ते के एक दिन जा सकेंगे। यह मूल रूप से सामुदायिक शिक्षा पर केन्द्रित होंगे और कई विद्यालयों के साथ मिल कर चलाए जाएँगे। विद्यालयों को बतौर ‘सामाजिक चेतना केंद्र’ भी स्थापित किया जाएगा।

सार्वजनिक विद्यालयों में होगा सुधार  

पुरानी शिक्षा नीति में ज़्यादातर नीति-निर्देश तैयार करने का अधिकार कुछ ही इकाइयों के पास है। मसलन, स्कूली शिक्षा विभाग। इसका तंत्र ऐसा है कि बड़े बदलावों की जगह बहुत कम बचती है। इसकी वजह से निजी क्षेत्र में शिक्षा का व्यवसायीकरण बहुत बढ़ा है। शिक्षा भले महँगी हुई है लेकिन यह तय नहीं हो पाया कि शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार हो पा रहा है या नहीं। 

इस ढाँचे में बदलाव के लिए कुछ निर्देश तैयार किए गए हैं। निजी से लेकर सार्वजनिक सभी तरह के विद्यालयों का उचित मूल्यांकन होगा। इससे बच्चों को बेहद शुरुआती स्तर से अच्छी शिक्षा मिलेगी। इसके अलावा Sustainable Development Goal4 (SDG4) सुनिश्चित किया जा सकेगा। सार्वजनिक विद्यालयों को बढ़ावा दिया जाएगा जिससे बच्चों को वहाँ भी अच्छी शिक्षा मिले। अभिवावकों को इस बात का विकल्प कि वह बच्चों का दाख़िला यहाँ भी करवा सकते हैं। National Achievement Survey (NAS) के तहत बच्चों की नियमित रूप से जाँच कराई जाएगी।  

उच्च शिक्षा के लिए कई खामियों का उल्लेख करते हुए उन पर काम करने की जरूरत बताई गई है। ये हैं;

  • सामाजिक आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के छात्रों के लिए संस्थानों में अलग प्रावधान न होना।
  • शिक्षक और संस्थागत स्वायत्तता न होने की वजह से छात्रों का विकास न होना।
  • पाठ्यक्रम और विषयों के विस्तृत न होने से छात्रों में समग्र गुणों की कमी।
  • विश्वविद्यालयों में फंडिंग न होने के चलते शोध और अनुसंधान की कमी।
  • विश्वविद्यालयों में गवर्नेंस और मानकों की कमी।
  • नियमों की अनदेखी और फ़र्ज़ी तरीके से चल रहे शैक्षिक संस्थानों में बढ़ोतरी।

उच्च शिक्षा का हिस्सा लिबरल आर्ट्स 

सॉफ्ट स्किल्स (बुनियादी कौशल) को भारतीय शिक्षा का अहम हिस्सा बनाया जाएगा। इसमें कला (विशेष रूप से लिबरल आर्ट्स) को सबसे ज़्यादा महत्व दिया जाएगा। छात्रों को ज़्यादा से ज़्यादा कला विधा की समझ और जानकारी देने के लिए तक्षशिला और नालंदा की पद्धति पर काम किया जाएगा।

बाणभट्ट के कादम्बरी में 64 कलाओं के बारे में विस्तार से बताया गया था। इसमें सिर्फ चित्र कला और गायन नहीं बल्कि विज्ञान से संबंधित तमाम विषय शामिल थे। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) में भी इस तरह की शिक्षा पर ज़ोर दिया जाएगा। इनके पाठ्यक्रम में भी ह्यूमैनिटीज़ और कला को शामिल किया जाएगा।

उच्च शिक्षा में मानव संबंधी मूल्यों को विशेष रूप से शामिल किया जाएगा, सत्य, धर्म, शांति, प्रेम, अहिंसा, नागरिक मूल्य और जीवन कौशल। एक एकेडमिक बैंक ऑफ़ क्रेडिट बनाया जाएगा जिसके तहत संस्थानों के क्रेडिट का ब्यौरा तैयार किया जाएगा।  

दुनिया में भारतीय शिक्षा को बढ़ावा

देश में अच्छा प्रदर्शन करने वाले विश्वविद्यालयों को कई बड़े अवसर दिए जाएँगे। एक ऐसा केंद्र तैयार किए जाएगा जिसमें विदेशी छात्र भारतीय छात्रों के साथ मिल कर अनुसंधान संबंधी विषयों पर काम कर सकते हैं। दूसरे देशों के साथ इस पर समझौते भी किए होंगे जिससे ज़्यादा से ज़्यादा संख्या में साझा कार्यक्रम पूरे किए जा सकें। इसमें छात्रों से लेकर प्राध्यापकों तक सभी शामिल होंगे। 

देश में अच्छा प्रदर्शन करने वाले विश्वविद्यालयों को दुनिया के कुछ देशों में अपना परिसर बनाने का मौक़ा मिलेगा। इसके अलावा दुनिया के 100 सबसे अच्छे विश्वविद्यालय भारत में अपना परिसर स्थापित कर सकेंगे। साथ ही छात्रों को उच्च शिक्षा मुहैया कराने के लिए उन्हें आर्थिक मदद भी की जाएगी। इसके लिए नेशनल स्कॉलरशिप पोर्टल को बढ़ाया जाएगा। इसके अलावा शिक्षक और छात्रों का अनुपात कम से कम 10:1 और ज़्यादा से ज़्यादा 20:1 रखने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।  


जिससे छात्रों की उच्च शिक्षा जारी रहे

देश के हर वर्ग और हर क्षेत्र से आने छात्र उच्च शिक्षा जारी रखें इसके लिए भी कई नए प्रावधान किए गए हैं। सबसे पहले सरकार उच्च शिक्षा के लिए फंड बढ़ाएगी। उच्च शिक्षा में लिंगानुपात पर भी विशेष ध्यान रखा जाएगा। देश में ज़्यादा से ज़्यादा स्पेशल एजुकेशन ज़ोन बनाए जाएँगे। विश्वविद्यालयों में भारतीय और स्थानीय भाषाओं में पढ़ाई कराने पर ज़ोर दिया जाएगा। 

उच्च शिक्षा में छात्रवृत्ति भी बढ़ाई जाएगी और शिक्षा में तकनीक का इस्तेमाल बढ़ाया जाएगा। उच्च शिक्षा में ऐसे बदलाव होंगे जिससे ज़्यादा से ज़्यादा छात्रों का रोज़गार सुनिश्चित हो। इस बात का ख़ास ख़याल रखा जाएगा कि पढ़ाई के दौरान किसी छात्र का शोषण न किया जा रहा हो।   

प्रोफेशनल स्टडीज़ को उच्च शिक्षा का अहम हिस्सा बनाया जाएगा। इसके लिए कृषि विश्वविद्यालय, विधि विश्वविद्यालय, स्वास्थ्य और विज्ञान विश्वविद्यालय, तकनीकी विश्वविद्यालय समेत हर तरह के शिक्षण संस्थानों को बढ़ावा दिया जाएगा। लक्ष्य के मुताबिक़ साल 2030 तक प्रोफेशनल स्टडीज़ प्रदान करने वाले हर संस्थान को समूह के तौर पर विकसित किया जाएगा। अलग-अलग प्रोफेशनल पाठ्यक्रम पढ़ाने वाले संस्थानों के लिए उनकी आवश्यकता के हिसाब से निर्देश तैयार किए जाएँगे।    

देश और दुनिया में ऐसी तमाम घटनाएँ हो रही हैं जिन पर शोध और अनुसंधान की ज़रूरत है। जैसे जलवायु परिवर्तन, जनसंख्या बढ़ोतरी और नियंत्रण, बायो टेक्नोलॉजी, डिजिटल दुनिया का प्रभाव और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे कई अहम मुद्दे। ऐसे ज़रूरी मुद्दों पर अच्छे नतीजे हासिल करने के लिए सरकार शोध और अनुसंधान पर विशेष ध्यान देगी।

शोध और अनुसंधान, Research & Innovation (R&I) इतना अहम विषय होने के बावजूद भारत इस पर अपनी जीडीपी का केवल 0.69 हिस्सा खर्च करता है। वहीं दूसरे देशों से तुलना करें तो अमेरिका 2.8%, इज़रायल 4.3%, चीन 2.1% और दक्षिण कोरिया 4.2% हिस्सा खर्च करता है। 

भारत भी अब इस क्षेत्र में बड़े पैमाने पर काम करने वाला है। भारत का इतिहास शोध और अनुसंधान के मामले में बेहद गहरा है, इस नीति में उसे वापस हासिल करने की बात की गई है। इसके लिए National Research Foundation (NRF) तैयार की जाएगी, जिसका काम देश के विश्वविद्यालयों में शोध कार्य को बढ़ावा देना होगा।

साथ ही यह विश्वविद्यालयों में होने वाले शोध का मूल्यांकन भी करेगा। इसके बाद कारगर शोध कार्यक्रमों की जानकारी सरकारी समूहों और एजेंसियों को देगा। शोध कार्यों को फंड दिलाना भी NRF के तहत ही आएगा।  

कैसे लागू होंगे उच्च शिक्षा के बेहतर विकल्प 

उच्च शिक्षा का स्वरूप बेहतर करने के लिए इसका रेगुलेटरी सिस्टम (लागू करने की पद्धति) बदला जाएगा। यह सारे कार्य भारतीय उच्च शिक्षा आयोग (HECI) के तहत किए जाएँगे। इस आयोग में 4 स्वतंत्र इकाइयाँ शामिल की जाएँगी। इनके जरिए उच्च शिक्षा का बुनियादी ढाँचा सुधारा जाएगा। इसकी सबसे पहली इकाई होगी,

  • National Higher Education Regulatory Council (NHERC) का काम मुख्यतः रेगुलेशन सुनिश्चित करना होगा।
  • National Accreditation Council (NAC) का काम मान्यता दिलाना होगा।
  • Higher Education Grants Council (HEGC) का काम फंडिंग उपलब्ध कराना होगा।
  • General Education Council (GEC) का काम शिक्षा के उचित मानक तय कराना होगा।

 उच्च शिक्षा में गवर्नेंस 

उच्च शिक्षा में गवर्नेंस को लेकर कई अहम कदम उठाए जाएँगे। सुविधाजनक मान्यता प्रणाली और स्वायत्तता तैयार की जाएगी। इसकी मदद से संस्थान खुद सकारात्मक बदलाव और बड़े कदम उठा सकेंगे। 

उच्च शिक्षा संस्थानों में बोर्ड ऑफ़ गवर्नर्स स्थापित किया जाएगा। इनका काम उच्च शिक्षा संस्थानों को राजनीति दखलंदाज़ी से बचाकर रखना होगा। प्राध्यापकों की भर्ती करना होगा और संस्थागत निर्णय लेना होगा। यह शिक्षाविदों और शिक्षा से जुड़े अनुभवी लोगों का एक समूह होगा जो उच्च शिक्षा संस्थानों के लिए स्वतंत्र रूप से काम करेगा। तय लक्ष्य के मुताबिक़ साल 2035 के अंत तक देश के लगभग सभी उच्च शिक्षा संस्थानों में बोर्ड ऑफ़ गवर्नर्स का यह समूह होगा।  

भाषाओं के ज़रिए युवाओं को पढ़ाने का लक्ष्य

इसके अलावा जिस बात पर सबसे ज़्यादा ज़ोर दिया जाएगा वह है युवाओं की शिक्षा और भारतीय भाषाओं का प्रचार। इन दो बातों के अलावा प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक कला और संस्कृति को भी शामिल किया जाएगा। दशकों पहले देश में राष्ट्रीय साक्षरता मिशन शुरू किया गया था, इसे आधार बनाते हुए सरकार देश के हर युवा को साक्षर और शिक्षित बनाने लक्ष्य लेकर चल रही है। देश भर में इसके लिए एडल्ट एजुकेशन सेंटर शुरू किए जाएँगे। 

नई शिक्षा नीति में ‘अतुल्य भारत’ को आधार बनाते हुए भारतीय संस्कृति के एक बड़े हिस्से को पढ़ाई में शामिल करने की बात कही है। यूनेस्को ने 197 भारतीय भाषाओं को लगभग लुप्त बताया है। पिछले 50 सालों में लगभग 50 भारतीय भाषाएँ लुप्त हो चुकी हैं। इसके अलावा एक और नए तरह का संस्थान शुरू किया जाएगा Indian Institute of Translation and Interpretation (IITI)। इसका काम व्याख्या और अनुवाद संबंधी काम को बढ़ावा देना होगा। 

भाषा और संस्कृति की पढ़ाई करने वालों के लिए छात्रवृत्ति शुरू की जाएगी। इतना ही नहीं डिजिटल इंडिया अभियान के तहत देश में आधुनिक माध्यमों के ज़रिए संवाद को बढ़ावा दिया जाएगा।  

जीडीपी का 6% शिक्षा पर 

नई शिक्षा नीति में ‘केन्द्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड’ को मज़बूत करने पर भी विशेष ध्यान दिया जाएगा। शिक्षा को सबसे ऊपर रखने के लिए मानव संसाधन विकास मंत्रालय का नाम बदल कर ‘शिक्षा मंत्रालय’ किया जाएगा। इसके अलावा नई शिक्षा नीति में सबसे ज़्यादा इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि शिक्षा के क्षेत्र में जीडीपी का 6% तक खर्च हो। फिलहाल यह 4.43% ही है। यह दुनिया के तमाम विकासशील और विकसित देशों से कमतर हैं। इसलिए नई शिक्षा नीति में शिक्षा पर किए जाने वाले खर्च को बढ़ावा देने की बात का ज़िक्र है। 

यह भारत की साक्षरता और अर्थव्यवस्था दोनों के लिए ही बहुत ज़रूरी है। सरकार इस योजना पर काम कर रही है कि 2030 से 2040 के दशक के बीच यह शिक्षा नीति पूरी तरह प्रभावी होगी।

जिनके कारण अंजाम तक पहुँचा राफेल डील, बीमारी के दिनों में राहुल गाँधी ने कैसे किया था उनका अपमान: फिर से याद कीजिए

मनोहर पर्रिकर ने लिखा था, राहुल गाँधी ने शिष्टाचार के बहाने उनसे मुलाकात की और फिर राजनीति के लिए उनकी इस मुलाकात का इस्तेमाल कर लिया। एक बीमार व्यक्ति को राहुल ने अवसरवादी राजनीति का शिकार बनाया, ये खुद पर्रिकर के ही आरोप थे। स्वास्थ्य का हाल जानने आए राहुल ने कैसे उस मुलाकात के बाद झूठ बोल कर उन्हें बदनाम किया, उससे वो काफी आहत और दुःखी हुए थे।


भारत में पाँच राफेल मल्टीरोल फाइटर एयरक्राफ्ट्स की लैंडिंग ने पूरे देश को उत्साह से भर दिया है और इसके लिए लोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को धन्यवाद देते नहीं थक रहे। लेकिन, एक और व्यक्ति ऐसा है जिसे आप भूल रहे हैं। सादगी की प्रतिमूर्ति और कर्मठता की मिशाल, जिसने राफेल डील पर हस्ताक्षर किए थे और जिसने अपने अंतिम दिनों तक गोवा की सेवा जारी रखी। जी हाँ, बात मनोहर पर्रिकर की हो रही है।

अप्रैल 2020 में ख़ुद केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी कहा था कि राफेल करार को एक नया जीवन दिया और उसे उसके अंजाम तक पहुँचाया। राजनाथ सिंह के शब्दों में समझें तो मनोहर पर्रिकर को उनके बेदाग़ करियर और निर्णय लेने की उनकी क्षमता को देखते हुए उन्हें रक्षा मंत्री जैसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील पद के लिए इसीलिए चुना गया था। उनके कारण ही आज 5 नेक्स्ट जनरेशन फिग़र जेट्स भारत के आकाश में मँडराए- एक सपना जो देश 30 सालों से देख रहा था।

तब राजनाथ सिंह ने कहा था कि काफी लम्बे समय तक भारत के पास कोई नेक्स्ट जेन फाइटर विमान नहीं आया। उन्होंने कहा था, “ये प्राकृतिक है कि हमारे जैसे देश को नेक्स्ट जेन फाइटर जेट्स की ज़रूरत है।” राजनाथ सिंह के शब्दों में, राफेल डील भी सालों से अटका पड़ा था और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मनोहर पर्रिकर को इसे अंजाम तक पहुँचाने की जिम्मेदारी दी। और फिर आया शुक्रवार (सितम्बर 23, 2019) का दिन।

यही वो दिन था जब मनोहर पर्रिकर ने बतौर रक्षा मंत्री अपने फ्रेंच समकक्ष के साथ राफेल करार पर हस्ताक्षर किए। वही वो क्षण था, जब आज के सपने को पंख लगे थे। आज मनोहर पर्रिकर इस दुनिया में नहीं है लेकिन जहाँ से भी वो अपने उस सपने को साकार होते देख रहे होंगे जिसके लिए उन्होंने मेहनत की थी, वो ज़रूर खुश होंगे। उन्होंने देश के लिए जो किया, उसके परिणाम आज दिख रहे हैं।

 राजनाथ सिंह मानते हैं कि राफेल डील की प्रक्रिया को तेज़ करने का श्रेय मनोहर पर्रिकर को ही जाता है। मनोहर पर्रिकर की श्रद्धांजलि सभा में पणजी में राजनाथ सिंह ने ये बातें कही थीं। पूर्व रक्षा मंत्री के योगदानों और राफेल डील में उनके रोल को याद करने के लिए आप वर्तमान रक्षा मंत्री को सुनिए। नीचे हम राजनाथ सिंह के यूट्यूब अकाउंट से उस वीडियो को ढूँढ कर आपके समक्ष पेश कर रहे हैं:


लेकिन, वही पर्रिकर जब कैंसर बीमारी से जूझते हुए भी गोवा में बतौर सीएम जनता की सेवा कर रहे थे, तब राहुल गाँधी ने कैसे राफेल करार को लेकर उनका अपमान किया था, ये आपको नहीं भूलना चाहिए और याद रखना चाहिए। राहुल गाँधी ने एक ईमानदार छवि वाले नेता को बदनाम करने की कैसे कोशिश की, ये भी आज इस मौके पर याद करना चाहिए, जब 5 राफेल हमारी ज़मीन पर उतर गए हैं।

राहुल ने कहा था कि मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर ने उनसे मुलाकात के दौरान बताया कि पीएम मोदी ने राफेल डील बदलते वक्त उनसे नहीं पूछा। राहुल गाँधी ने उस मुलाक़ात के बाद कहा था:“मैं कल पर्रिकर जी से मिला था। पर्रिकर जी ने स्वयं कहा था कि (राफेल) डील बदलते समय पीएम ने हिंदुस्तान के रक्षा मंत्री (तब मनोहर पर्रिकर) से नहीं पूछा।” राहुल गाँधी ने अपने प्रोपेगंडा के लिए एक बीमार नेता का इस्तेमाल किया।

एडवांस पैंक्रियाटिक कैंसर से पीड़ित पर्रिकर तब काफ़ी दिनों से बीमार चल रहे थे। कई सरकारी कार्यक्रमों के दौरान उनके नाक में पाइप लगे देखा गया था। ये तस्वीरें वायरल भी हुई थीं। बीमारी के बावजूद कार्यभार संभाल रहे पर्रिकर की कई लोगों ने प्रशंसा भी की थी। राहुल गाँधी के बेतुके आरोपों के बाद मनोहर पर्रिकर ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर राहुल के दावों की पोल खोलते हुए कहा था कि उनके व्यवहार से वो काफ़ी आहत हुए हैं।

आज आप फिर से उस पत्र को पढ़ें, जिसे मनोहर पर्रिकर ने राहुल गाँधी के आरोपों का जवाब देते हुए लिखा था और एक-एक बात क्लियर की थी। नीचे हम उस पत्र का टेक्स्ट आज फिर से आपके समक्ष पेश कर रहे हैं, ताकि राफेल विमानों की डील को अंजाम तक पहुँचाने वाले का किसने अपमान किया, ये आप न भूलें:

“प्रिय श्री राहुल गाँधी,
कल यानी 29 जनवरी 2019 को, बिना किसी पूर्व सूचना के आप मेरे स्वास्थ्य का हाल पूछने मेरे यहाँ आए थे। दलगत भावना से ऊपर उठकर एक अस्वस्थ व्यक्ति का हाल जानना एवं उसके उत्तम स्वास्थ्य की कामना करना, राजनीतिक एवं सार्वजनिक जीवन की अच्छी परंपरा है, अतः मुझे भी आपका मेरा हाल जानने के लिए कार्यालय आना अच्छा लगा। आपके आने पर मैंने आपका स्वागत मेरे स्वास्थ्य एवं बीमारी प्रति आपकी अच्छी भावना के संदर्भ में किया।

लेकिन आज सुबह समाचार पत्रों में जिस ढंग से आपके ‘विजिट’ को लेकर बयान प्रकाशित हुए हैं, उन्हें पढ़कर मुझे आश्चर्य भी हुआ और मैं आहत भी हूँ। आपको कोट करते हुए सामाचार पत्रों में प्रकाशित है कि आपने कहा है, “बातचीत में मैंने आपको बताया है कि राफ़ेल प्रोसेस में मैं कहीं नहीं था, या मुझे कोई जानकारी नहीं थी।

मेरे लिए यह अत्यंत निराशाजनक और आहत करने वाली बात है कि मेरे स्वास्थ्य का हाल जानने के बहाने आपने अपने निम्न स्तरीय राजनीतिक हितों को साधने का कार्य किया है, इसकी मैं कल्पना भी नहीं कर पा रहा।


आपसे 5 मिनट की हमारी भेंट में ना तो ‘राफ़ेल’ का जिक्र हुआ और ना ही मैंने राफ़ेल संबंधी कोई चर्चा की। उन 5 मिनटों में इस संबंध में कोई चर्चा नहीं हुई। इस तरह की कोई बात मेरी और आपके बीच न तो हाल की मीटिंग में हुई थी और ना ही पहले कभी हुई।

मैंने पहले भी कई बार स्पष्ट किया है और इस पत्र के माध्यम से फिर कह रहा हूँ कि राफ़ेल सौदा इंटर गवर्नमेंट एग्रिमेंट (IGA) और डिफेंस प्रोक्योरमेंट प्रोसिज़र के नियमों के तहत हुआ है। इसमें दूर-दूर तक कोई गड़बड़ी नहीं हुई है। यह पूरी खरीद प्रक्रिया राष्ट्रीय सुरक्षा की प्राथमिकताओं के आधार पर तय नियामकों के तहत हुई है।

शिष्टाचार भेंट के बहाने मेरे घर आकर, फिर इतने निम्न स्तर का झूठ आधारित राजनीतिक बयान देना, आपके मेरे घर आने के आने उद्देश्यों और इरादों को उजागर करता है। आपके मेरे घर आने पर यह एक बड़ा प्रश्नचिह्न और संदेह का घेरा भी है।

जैसा कि सभी जानते हैं, इन दिनों मैं बीमारी में अपने जीवन के अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा हूँ। फिर भी अपने पूर्व के अनुशासनपूर्ण जीवन एवं वैचारिक शक्ति के माध्यम से गोवा की जनता की सेवा में निरंतर लगा हूँ, और लगा रहूँगा। मैंने सोचा था कि आपका आना और आपकी शुभकामनाएँ मेरे लिए इस प्रतिकूल स्थिति में सम्बल प्रदान करेगी, लेकिन मैं नहीं समझ सका कि आपके आने का वास्तविक इरादा क्या था।

घोर निराशा के साथ मुझे आपको लिखना पड़ रहा है कि आप सच को स्वीकारिए और सामने लाइए। साथ ही, यह भी निवेदन करूँगा कि किसी बीमार और अस्वस्थ व्यक्ति को अपने अवसरवादी राजनीति का शिकार बनाने की नीयत मत रखिए। मैं सदैव गोवा की जनता की सेवा में हर पल तत्पर हूँ।


सादर
मनोहर पर्रीकर
“


जैसा कि मनोहर पर्रिकर ने लिखा था, राहुल गाँधी ने शिष्टाचार के बहाने उनसे मुलाकात की और फिर राजनीति के लिए उनकी इस मुलाकात का इस्तेमाल कर लिया। एक बीमार व्यक्ति को राहुल ने अवसरवादी राजनीति का शिकार बनाया, ये खुद पर्रिकर के ही आरोप थे। स्वास्थ्य का हाल जानने आए राहुल ने कैसे उस मुलाकात के बाद झूठ बोल कर उन्हें बदनाम किया, उससे वो काफी आहत और दुःखी हुए थे।

आज जब अम्बाला में पाँच राफेल विमान उतरे हैं और लोग इसकी तस्वीरें देख कर ख़ुशी मना रहे हैं, हमें मनोहर पर्रिकर को याद कर के पल भर के लिए भावुक भी हो जाना चाहिए और राहुल गाँधी द्वारा अंतिम दिनों में किए गए उनके अपमान के लिए थोड़ी देर आक्रोश भी जताना चाहिए। जैसा कि वामपंथी गैंग और इस्लामी कट्टरवादी कहते हैं- “नहीं भूलेंगे“। अब राष्ट्रवादी भी इसे याद रखें।


जब हुआ मंदिरों का ध्वंस, तब किस दोजख में था सौहार्द? – यह ‘हिंदू’ बनने का वक्त, ‘सेकुलर’ नौटंकी से बचो

वाजपेयी ने कहा था कि राम का मंदिर छल और छद्म से नहीं बनेगा। राम का मंदिर अगर बनेगा तो एक नैतिक विश्वास के बल पर बनेगा। वो वक्त करीब आ गया है। हिंदू अपने गौरव के प्रतीक, अपने नैतिक बल के प्रतीक को रामभक्त मुसलमान की ईंट, मिट्टी और श्रद्धा से दूषित नहीं होने देगा।


दिसंबर 17, 1992 के दिन, लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर बहस के दौरान अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था- “जहाँ मैंने आरंभ किया था, मैं वहीं समाप्त करना चाह रहा हूँ। मैंने कहा था कि देश तिराहे पर खड़ा है। एक तरह की सांप्रदायिकता को बढ़ावा देकर, एक तरह की कट्टरता को बढ़ावा देकर, आप दूसरी तरह की कट्टरता से नहीं लड़ें, मगर आप यही कर रहे हैं और अब इस समय आइए, हम एक नई शुरुआत करें। अयोध्या, जैसा मैंने शुरू में कहा था कि अवसर में बदला जा सकता है।”

वाजपेयी करीब तीन दशक पहले जिस सांप्रदायिकता और कट्टरता को लेकर आगाह कर रहे थे, क्या वह जमशेद खान के यह कहने से, “हमने इस्लाम अपनाया और इस्लाम के अनुसार ही हम प्रार्थना करते हैं। लेकिन धर्म बदलने से हमारे पूर्वज नहीं बदल जाते। राम हमारे पूर्वज थे और हम अपने हिंदू भाइयों के साथ इसे मनाएँगे।”, खत्म हो गई है?

या सईद अहमद के यह कहने से, “हम भारतीय मुस्लिम मानते हैं कि राम इमाम-ए-हिंद थे और मैं अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के दौरान मौजूद रहूँगा।”, से वह समय आ गया है जिसका जिक्र वाजपेयी कर रहे थे?

या राशिद अंसारी जब कहते हैं, “अगर हमें गर्भगृह में जाने का मौका मिलता है, जहाँ शिलान्यास किया जाएगा, तो यह हमारे लिए आशीर्वाद की तरह होगा। अगर सुरक्षा वजहों से हमारा प्रवेश रोका जाता है तो हम बाहर से जश्न का हिस्सा बनेंगे।”, तो वह एक नई शुरुआत की बात कर रहे होते हैं? या फिर छत्तीसगढ़ से भूमि पूजन के लिए ईंट लेकर फैज खान की यात्रा को अवसर में बदला जा सकता है?

सवाल कई हैं और ‘अच्छा हिंदू’ ‘रामभक्त मुसलमान’ पर लहालोट हुआ जा रहा है। 5 अगस्त को अयोध्या में भव्य श्रीराम मंदिर का भूमिपूजन होगा। देश के प्रधानमंत्री मौजूद होंगे। साधु-संत और भव्य राम मंदिर की संघर्ष यात्रा के कई पथिक भी उपस्थित रहेंगे। कितना आसान, कितना मधुर लगता है सब कुछ।

लेकिन हिंदू के सवाल यहीं से खड़े होते हैं। क्या उत्तर प्रदेश और केंद्र में आज बीजेपी की सरकार न होती, तब भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद यह सब इतना ही आसान होता है? ‘अच्छा हिंदू’ कहेगा कि क्यों नहीं?

लोकतांत्रिक व्यवस्था में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ कौन सी सरकार जाएगी। लेकिन हिंदू मन सवाल करता है कि शाहबानो के हक में भी फैसला इसी सुप्रीम कोर्ट ने दिया था, पर एक सरकार ही थी जो इसके खिलाफ अध्यादेश ले आई।

हिंदू मन कहता है कि वो भी एक यूपी की ही सरकार थी, जिसने राम भक्त कार सेवकों की लाश से अयोध्या और सरयू को पाट दिया था। फिर 1992 की वह बीजेपी सरकार भी थी, जिसने राम भक्तों पर गोली चलाने का आदेश देने की जगह, सत्ता का बलिदान कर दिया।

हिंदू मन को अचानक से राम मंदिर पर पैदा सौहार्द्र से शक होता है। लेकिन यह जान कर भी कि रामलला के पक्ष में फैसला आने पर सुप्रीम कोर्ट की नीयत पर सवाल उठाए गए थे, अच्छा हिंदू ‘रामभक्त मुसलमान’ पर मर मिटेगा। उसके तर्क बड़े भोले होंगे। वह कहेगा मैं अपने घर में पूजा करूँ और मेरा कोई मुस्लिम मित्र आएगा तो मैं कैसे मना कर दूँगा।

वह भावनाओं के ज्वार में उतराता जाएगा। और यह ज्वार कौन पैदा कर रहा है। वही मीडिया, वही वामपंथी। चूँकि तमाम तीन तिकड़म के बाबवजूद जब वे भव्य राम मंदिर के निर्माण में अड़ंगा नहीं डाल पा रहे हैं तो मीठी गोली से शिकार पर उतर आए हैं और वे भी जानते हैं अच्छा हिंदू इस जाल में फँसेगा।

लेकिन हिंदू यह जानना चाहता है कि अयोध्या, मथुरा, काशी सहित देश के तमाम हिस्सों में मंदिरों का ध्वंस कर उस पर मस्जिद खड़े करने के भागीदार (जिनके नाम भी जमशेद, सईद और फैज जैसा ही कुछ रहा होगा) के पूर्वज राम नहीं थे। तब किस दोजख में दबा था यह सौहार्द्र?

1856 में मिर्जा जान ने लिखा था,

“मुगल बादशाहों ने बनारस और काशी में मंदिरों को तोड़कर उनके मलबे से मस्जिदें बनाईं। ऐसा ही अयोध्या में हुआ। अयोध्या राम के पिता की राजधानी कही जाती है। यह हिंदुओं के लिए पूजा का सबसे पवित्र स्थान है। यहाँ मंदिर की एक-एक दीवार को तोड़कर उसके मलबे और पत्थरों से ही मस्जिद बनाई गई। जहाँ विशाल मंदिर था उसे तोड़कर मैदान कर दिया गया। उसे ही मस्जिद का अहाता बनाया गया। बादशाह बाबर ने यह काम तो बहुत अच्छा किया, 1526 में मंदिर को तोड़कर शानदार मस्जिद बनवाई, लेकिन मुश्किल यह है कि अभी भी यह मस्जिद सीता की रसोई मस्जिद के तौर पर ही जानी जाती है।”


नवाबों की हुकूमत खत्म होने के बाद अंग्रेजों के जमाने में 1858 में बाबरी मस्जिद के मुअज्जीन ने जो कोर्ट में अपील की थी, उसमें भी इसे जन्मस्थान मस्जिद बताया था। उसका कहना था कि मस्जिद सैकड़ों साल से वीरान है और हिंदू ही वहाँ पूजा करते आ रहे हैं।

अंग्रेजी हुकूमत के गजेटियर से लेकर तमाम दस्तावेज यह बताते हैं कि वह जगह रामलला की थी। यह सब जानने के बाद हिंदू मन पूछना चाहता है कि फिर आजाद भारत में नेहरू ने रामलला की मूर्ति उस जगह से क्यों हटवानी चाही थी?

क्यों इतना लंबा संघर्ष हिंदुओं को करना पड़ा? क्यों इतनी लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी गई? क्या तब जमशेद और फैज के कौम को यह नहीं पता था कि उनके पूर्वज कौन थे? क्या उन्हें यह दिव्य ज्ञान अगस्त 05, 2020 की तारीख तय होने के बाद हुई?

अच्छा हिंदू कहेगा- “छोड़ो कल की बातें कल की बात पुरानी।” फिर जमशेद और फैज के पूर्वजों की बात भी तो पुरानी ही है। जमशेद और फैज की आज की पहचान तो कहती है कि बुतपरस्ती हराम है। उनके लिए हम काफिर हैं। वैसे भी धर्म आस्था का मसला है। जीवन जीने का सलीका है। जिनके लिए हिंदुत्व की जीवनशैली नापाक है, उनकी मिट्टी, उनकी आस्था का हिंदू क्यों आचार डालें। जमशेद और फैज जैसे यह भी तो कह सकते हैं कि भूमि पूजन के पवित्र मौके पर हम अपने पूर्वजों के धर्म में वापसी करेंगे।

लेकिन वे न ऐसा कुछ कहेंगे और न करेंगे। वे मोहरे हैं। उनसे आप सवाल करेंगे तो मीडिया आपको कट्टर हिंदू बताएगा। बताएगा कि ​आप सेकुलर भारत के लिए खतरनाक हैं। और आप सर्टिफिकेट पाने की लालसा में अच्छा हिंदू बनने को तैयार हो जाएँगे।

फिर भी हिंदू मन इस मीडिया से पूछता रहेगा, तुम्हारी क्यों सुने? तुमने मंदिर के पैरोकार रहे परमहंस रामचंद्र दास को कट्टर और बाबरी मस्जिद के मुद्दई हाशिम अंसारी को उदरावाद का प्रतीक बताया। मुस्लिम इंडिया नाम से अखबार प्रकाशित करने वाला, गणतंत्र दिवस को ब्लैक डे के तौर पर मनाने का आह्वान करने वाला सैयद शहाबुद्दीन तुम्हारे लिए प्रोग्रेसिव मुसलमान था।

लेकिन साध्वी ऋतंभरा, उमा भारती, विनय कटियार जैसों को उन्मादी बताया। राम सेवकों की लाश बिछाने वाला मौलाना मुलायम तुम्हारे लिए समाजवादी है और राम रथ यात्रा निकालने वाला आडवाणी सांप्रदायिक।

हम तुम्हारी इन साजिशों को अब खूब समझते हैं। हम हिंदू बनेंगे। नहीं बनना अब तुम्हारे लिए अच्छा हिंदू। हम जानते हैं कि प्रोगेसिव मुसलमान, उदारवादी मुसलमान तुम्हारे गढ़े वे शब्द हैं, जिससे तुम इनके जिहादी मानसिकता पर पर्दा डालते हो। जिस मौलाना आजाद को तुम उदारवादी बताते रहे, उसने आजाद भारत की शिक्षा-व्यवस्था को वह शक्ल दी, जिससे मुसलमानों का खूनी इतिहास दब जाए और हिंदू अपनी पहचान पर शर्मिंदा हों।

वाजपेयी ने कहा था राम का मंदिर छल और छद्म से नहीं बनेगा। राम का मंदिर अगर बनेगा तो एक नैतिक विश्वास के बल पर बनेगा। वो वक्त करीब आ गया है। हिंदू अपने गौरव के प्रतीक, अपने नैतिक बल के प्रतीक को रामभक्त मुसलमान की ईंट, मिट्टी और श्रद्धा से दूषित नहीं होने देगा।


रिया-महेश भट्ट पर कंगना के खुलासे और सुशांत के पिता के 7 सवाल से ‘आत्महत्या’ प्रकरण में जुड़े कई नए रहस्य आए सामने

कंगना ने लिखा है कि रिया चक्रवर्ती पिछले 6 महीनों से सुशांत के साथ थी, उसने महेश भट्ट को अपने मनोचिकित्सक के रूप में काम पर रखा था और उसकी मृत्यु से दो दिन पहले ही रहस्यमय तरीके से सभी गायब हो गए थे। टीम कंगना ने ट्विटर पर लिखा है कि उन्हें खुशी है कि इस पूरे मामले की अब जाँच की जाएगी।


सुशांत सिंह राजपूत की प्रेमिका रिया चक्रवर्ती के खिलाफ उनके गृहनगर पटना में प्राथमिकी दर्ज की गई है। इसके बाद अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत को लेकर कई नए खुलासे सामने आए हैं। एक ओर जहाँ अभिनेता सुशांत के पिता ने रिया चक्रवर्ती पर उनसे उनके रूपए ऐंठने और उन्हें आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराधी बताया है वहीं, सुशांत की मौत के बाद से ही बॉलीवुड और इसके भीतर चलने वाले नेपोटिज्म के खिलाफ अभियान छेड़ने वाली अभिनेत्री कंगना रनौत ने भी इस बात पर ख़ुशी व्यक्त की है कि अब इस मामले की जाँच की जाएगी।

ट्विटर पर ‘टीम कंगना’ ने एक ट्वीट किया है, जिसमें टीम कंगना ने लिखा है कि रिया चक्रवर्ती पिछले 6 महीनों से सुशांत के साथ थी, उसने महेश भट्ट को अपने मनोचिकित्सक के रूप में काम पर रखा था और उसकी मृत्यु से दो दिन पहले ही रहस्यमय तरीके से सभी गायब हो गए थे। टीम कंगना ने ट्विटर पर लिखा है कि उन्हें खुशी है कि इस पूरे मामले की अब जाँच की जाएगी।

आज ही सुशांत सिंह राजपूत के पिता ने अपनी FIR में कई ऐसे सवाल उठाए हैं जो इस पूरे मामले पर एक बार फिर से सोचने को मजबूर कर देते हैं। सुशांत के पिता ने अपनी शिकायत में कहा कि रिया से मिलने से पहले सुशांत मानसिक रूप से ठीक था, लेकिन फिर ऐसा क्यों हुआ कि उसके संपर्क में आने के बाद वह मानसिक रूप से डिस्टर्ब हो गया था?

सुशांत के पिता ने FIR में 7 सवाल किए हैं, जिनमें से एक में उन्होंने उन सभी डॉक्टर्स पर भी संदेह व्यक्त किया है, जो-जो उनके बेटे सुशांत का इलाज कर रहे थे। सुशांत के पिता ने आरोप लगाया कि अगर उनके बेटे की मानसिक हालत ठीक नहीं चल रही थी तो उसके परिवार वालों को इसकी सूचना क्यों नहीं दी गई? जबकि इसकी पहली सूचना परिवार को मिलनी चाहिए थी।

सुशांत के पिता ने FIR में कहा है कि रिया ने अपना मोबाइल नंबर बदलने के लिए उनके बेटे पर दबाव बनाया था, ताकि वह अपने करीबी लोगों से बात नहीं कर सके। रिया ने सुशांत के करीबी स्टाफ को भी चेंज करवा दिया था जो उनके लिए काम किया करते थे।

एफआईआर के अनुसार, रिया चक्रवर्ती ने सुशांत के सामने ये शर्त रखी थी कि वह सिर्फ वही प्रोजेक्ट करे, जिनमें रिया उसके साथ काम करेगी। FIR में कहा गया है कि सुशांत के करोड़ों रुपए पर भी रिया की नजर थी।

FIR में सुशांत के पिता ने खुलासा किया है कि सुशांत फिल्म लाइन छोड़ कर केरल में ऑर्गेनिक खेती करना चाहता था, उसका दोस्त महेश उसके साथ कुर्ग जाने के लिए तैयार था, लेकिन रिया ने इस बात का विरोध करते हुए सुशांत से कहा था कि वो कहीं नहीं जाएगा। बॉलीवुड छोड़कर खेती करने के फैसले पर रिया ने सुशांत से कहा था कि अगर वो उसकी बातें नहीं मानेगा तो वो मीडिया में उसकी मेडिकल रिपोर्ट शेयर कर सबको बता देगी कि सुशांत पागल है।

सुशांत के पिता ने अपनी शिकायत में लिखा है कि जब रिया को लगा की सुशांत सिंह उसकी बात नहीं मान रहा है और उसका बैंक बैलेंस भी बहुत कम रह गया है, तो रिया को लगा कि अब सुशांत उसके किसी काम का नहीं है।

इसके बाद रिया, जो कि तब तक सुशांत के साथ रह रही थी, उसने 08 जून 2020 को सुशांत के घर से काफी सामान कैश, जेवरात, लैपटॉप , पासवर्ड, क्रेडिट कार्ड, उनके पिन नम्बर जिसमें सुशांत के अहम दस्तावेज, और ट्रीटमेंट के सारे कागज लेकर चली गई।

सुशांत के पिता ने FIR में कहा, “जाने के बाद उसने मेरे बेटे सुशांत का फोन नम्बर अपने फोन में ब्लॉक कर दिया। फिर सुशांत ने मेरी बेटी को फोन किया, सुशांत ने कहा कि रिया मुझे कहीं फँसा देगी, वो यहाँ से काफी सामान लेकर चली गई है। मुझे धमकी देकर गई है कि अगर तुमने मेरी बात नहीं मानी तो तुम्हारे इलाज के सारे कागज मीडिया को दे दूँगी।”



पेड़ में बाँधकर मारते, कहते थे धर्म बदलो-मुसलमान बनो: सिख निधान सिंह ने बताया अफगानिस्तान में क्या-क्या झेला

"मुझे गुरुद्वारे से अपहरण कर लिया गया था और 20 घंटे बाद मैं खून से लथपथ था। मैं एक पेड़ से बँधा हुआ था। वे मुझे मारते थे और मुस्लिम बनने के लिए दवाब डालते थे। मैंने उनसे बार-बार कहा कि मुझे धर्म क्यों बदलना चाहिए, मेरा अपना धर्म है।"


अफगानिस्तान से 11 सिख रविवार (जुलाई 27, 2020) को भारत आए। इनमें तालिबानियों से बचाई गई नाबालिग और गुरुद्वारा से अगवा किए गए निधान सिंह भी शामिल हैं। उ

भारत पहुँचने के बाद भावुक होते हुए निधान सिंह सचदेवा ने कहा, “मुझे नहीं पता हिंदुस्तान को क्या कहना है, मेरी माँ या पिता मगर हिंदुस्तान तो हिंदुस्तान है। हिंदुस्तान में कोई कमी नहीं है। आतंकी मुझे कहते थे कि मुसलमान बनो, मैं कहता था “वाहेगुरू जी दा खालसा वाहेगुरु जी दी फतेह मैं अपना धर्म क्यों बदलूँ।”

उन्होंने तालिबानी आतंकियों द्वारा अगवा करने की घटना को याद करते हुए बताया कि उन्हें रोज मारा जाता था, पेड़ में बाँधकर रखा जाता था और इस्लाम अपनाने के लिए कहा जाता था।

निधान सिंह ने अपनी दर्द भरी दास्तां सुनाते हुए कहा, “मुझे गुरुद्वारे से अपहरण कर लिया गया था और 20 घंटे बाद मैं खून से लथपथ था। मैं एक पेड़ से बँधा हुआ था। वे मुझे मारते थे और मुस्लिम बनने के लिए दवाब डालते थे। मैंने उनसे बार-बार कहा कि मुझे धर्म क्यों बदलना चाहिए, मेरा अपना धर्म है।”

निधान सिंह ने अपनी दर्द भरी दास्तां सुनाते हुए कहा, “मुझे गुरुद्वारे से अपहरण कर लिया गया था और 20 घंटे बाद मैं खून से लथपथ था। मैं एक पेड़ से बँधा हुआ था। वे मुझे मारते थे और मुस्लिम बनने के लिए दवाब डालते थे। मैंने उनसे बार-बार कहा कि मुझे धर्म क्यों बदलना चाहिए, मेरा अपना धर्म है।”

निदान सिंह के साथ एक 16 साल की नाबालिग युवती सुनमित कौर भी भारत आई है। उसका अपहरण कर जबरन मुस्लिम बनाकर निकाह करवाया जा रहा था। ये सभी अभी शॉर्ट टर्म वीजा पर भारत आए हैं।

अफगानिस्तान में सिख काफी लंबे समय से आतंकियों के निशाने पर हैं। उन्हें भारत को चोट पहुँचाने के लिए निशाना बनाया जाता है। काबुल के गुरुद्वारे में हुए आतंकी हमले में 27 सिखों की मौत हो गई थी। भारत ने घटना की निंदा की थी और स्थिति पर गंभीर चिंता जताई थी।

अफगान सिख समुदाय के नेताओं ने भारत सरकार से अपील की है कि वो अफगानिस्तान में सिखों और हिन्दुओं की रक्षा करें और उन्हें दीर्घकालिक लम्बे समय तक भारत में रहने की अनुमति उपलब्ध करवाए। जिसके बाद भारत सरकार ने अफगानिस्तान के 700 सताए सिखों को जल्द ही देश लाने और आश्रय देने का फैसला किया है।


लव जिहाद और वामपंथी नैरेटिव: हिंदू नारीवादी विमर्शों से ही खतरे का मुकाबला संभव

हिंदू महिलाओं को आगे आकर फेमेनिज्म के नए विमर्श को अपने कँधे पर उठाना पड़ेगा। नहीं तो प्रिया चौधरी, हिना तलरेजा, निमिषा, प्रज्ञा देवनाथ जैसी लड़कियाँ सेक्स स्लेव, हत्या, बलात्कार और अवसाद का शिकार हो कर दम तोड़ती रहेंगी।


मेरठ में माँ-बेटी के ह्रदय विहीन क़त्ल ने एक बार फिर भारत में लव जिहाद के विमर्श को हवा दी है। 30 वर्षीय शादीशुदा मुस्लिम युवक शमशाद ने अपना मुस्लिम नाम छुपा कर पहले तो तलाकशुदा प्रिया चौधरी को प्रेम जाल में फँसाया और उत्तर काल में उसके नमाज पढ़ने में आनाकानी करने के कारण हत्या कर दी।

वीभत्स बात तो यह है कि इस पूरे घटनाक्रम की गवाह पीड़िता की पाँच साल की छोटी बेटी को भी उसकी माँ के साथ ही मोहम्मद शमशाद ने मार कर घर में दफ़न कर दिया।

दूसरी घटना पश्चिम बंगाल के हुगली जिले की है, जब गीता देवनाथ को अख़बारों के हवाले से सूचना हुई कि वर्ष 2016 में घर से जरूरी काम से बाहर गई बेटी प्रज्ञा देवनाथ (नया नाम आयशा जन्नत माहुना) बांग्लादेश के सबसे खतरनाक इस्लामिक आतंकी संगठन जमात-उल-मुजाहिदीन (JMB) में जा कर शामिल हो गई है और बांग्लादेशी एजेंसियों की गिरफ्त में आने से पहले तक वह जमात के नारी वाहिनी में काम कर रही थी।

क्या है लव जिहाद ?

मेरी नज़र में “लव जिहाद ऐसा मजहबी कृत्य है जिसमें मुस्लिम अपनी पहचान छुपा कर हिंदू या इसाई लड़कियों के साथ वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित करते हैं या करने का प्रयास करते हैं। ऐसे मामलों में मुस्लिमों की पहचान उजागर होने के बाद हिंदू या ईसाई लड़कियों को धोखे का एहसास होता है और वह इस विषय को खुद/धार्मिक संगठन या परिवारवालों की मदद से उजागर करने का प्रयास करती हैं।”

इस विषय की पहली व्याख्या वर्ष 2009 में दुनिया के महान राजनैतिक-धार्मिक विश्लेषक स्टीफन ब्राउन ने की थी l वो लव जिहाद की व्याख्या करते हुए लिखते हैं, “The love jihad’s modus operandi involves a heartless strategy of luring vulnerable girls and young women to convert to Islam by feigned love and promises of marriage. But instead of marital bliss, the girls unwittingly trapped in its deceitful web usually wind up in the hands of Muslim fundamentalist organizations.”

उनका कहना है कि लव जिहाद उन्मादी मजहबी लक्ष्य से प्रेरित एक ऐसा कृत्य है, जिसमें गैर इस्लामिक लड़कियों का धर्म परिवर्तन के लिए मुस्लिम धोखा और अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हैं।

लव जिहाद का सबसे खतरनाक पहलू तब सामने आता है जब हिंदू या इसाई लड़की को यह पता चलता है कि हिंदू नाम का लड़का वास्तव में मुसलमान है और उसका लक्ष्य मोहब्बत नहीं बल्कि इस्लाम में धर्म परिवर्तन है। देश में ऐसे कई मामले हैं जहाँ ऐसी कई लड़कियों का सिर्फ इसलिए बेरहमी से क़त्ल कर दिया गया, क्यूँकि उसने इस्लाम मानने से मना कर दिया। ऐसे कई मामलों में एक हिना तलरेजा का मामला भी है।

हिना तलरेजा एक हाई प्रोफाइल लड़की थी। उसकी हुक्का बार में अदनान खान नाम के एक लड़के से दोस्ती हुई। वर्ष 2017 के जुलाई महीने में अदनान खान ने अपने दो दोस्तों के साथ हिना तलरेजा का बलात्कार किया और फिर उसके माथे पर गोली मारकर हत्या करने के बाद फरार हो गया।

अभी जनवरी माह में केरल के सबसे बड़े कैथेलिक चर्च समूह सायरो-मालाबार ने अपनी गंभीर छानबीन के बाद यह पाया कि केरल लव जिहाद से बुरी तरह ग्रसित है। इस डरावने विषय पर उनका यह मानना था कि गैर इस्लामिक धर्म की लड़कियों का इस्लाम में परिवर्तन ना सिर्फ भारत के सेक्युलर ढाँचे के लिए खतरा है, बल्कि इससे सामाजिक ताना-बाना भी प्रभावित हो रहा है।

केरल के लव जिहाद का मॉडल इतना खतरनाक है कि इसमें ना सिर्फ उन्मादी मुसलमान अपनी पहचान छुपा कर हिंदू और ईसाइयों का धर्म परिवर्तन करते हैं, बल्कि उन्हें इस्लामिक स्टेट जैसे संगठनों को आउटसोर्सिंग भी करते हैं। यानी हिंदू और ईसाई, लड़कियों का लव जिहाद के नाम पर इस्लामिक संगठनों के वजूद के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है।

निमिषा (केरल) और प्रज्ञा देवनाथ (धानीखाली, हुगली जिल्ला, पश्चिम बंगाल) इसके कई उदाहरणों में से एक उदहारण हैं।

सबसे बड़ा प्रश्न

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि भले ही वामपंथी झुकाव वाले मीडिया और अकादमिक संस्थान इस मुद्दे को नकारते रहते हैं या फिर कुछ अपवाद जैसे अखिला अशोकन (केरल) के मुद्दे से वास्तविक लव जिहाद के मुद्दों को सामाजिक सौहार्द्र और गंगा-जमुनी तहजीब का हवाला देने लग जाते हैं, लेकिन समय-समय पर लव जिहाद के नाम पर उत्पीड़न के मामले, हत्या, धोखा और बलात्कार की मीडिया रिपोर्टिंग किस बात की गवाही देती है?

अब तक इस देश में लव जिहाद की लाखों घटनाएँ हो चुकी हैं और ऐसी लाखों घटनाएँ समाज में हो रही होंगी, लेकिन स्त्री अस्मिता से जुड़ा यह मुद्दा होने के बावजूद ऐसे मामले भारत की नारीवादियों के विमर्श से गायब क्यूँ हैं, जबकि लव जिहाद तो पुरुषों के मजहबी सत्ता की पराकाष्ठा है। इस कृत्य में ना सिर्फ उन्मादी मुस्लिम पुरुष अपनी पहचान छुपा कर हिंदू और इसाई लड़कियों के साथ मानसिक, शारीरिक और सामाजिक सम्बन्ध बनाते हैं, बल्कि इन तीन तरह के समबन्धों का दुरुपयोग भी करते हैं। साथ-साथ मजहब का पटाक्षेप होने पर उन्मादी युवक उनकी हत्या, दोस्तों संग बलात्कार और सामाजिक छवि को बर्बाद भी करते हैं।

क्या यह सोचने की बात नहीं है कि लव जिहाद भारत में एक सामान्यीकृत उपलब्ध सामाजिक बुराई का स्वरुप ले चुका है। फलस्वरूप आज यह ना सिर्फ धार्मिक रूप से सहिष्णु हिन्दुओं के अस्तित्व पर संकट की स्थिति पैदा कर दी है, बल्कि इसने स्त्रियों की मर्यादा पर भी एक प्रश्न चिह्न खड़ा किया है। लेकिन सबसे दुखद बात यह है कि इतना कुछ होने के बावजूद भी अब तक यह भारतीय नारीवादी विमर्शों का विषय नहीं पाया बन पाया है।

आज भारतीय नारीवादियों को 19वीं शताब्दी के गड़े मुर्दों पर विमर्श का मौका मिल जाता है। सती प्रथा, बाल विवाह पर आत्ममुग्ध करने वाले विषयों पर सेमिनारों में जीभ नचा-नचा कर बोलने का मौका मिल जाता है। लेकिन इन कॉपी-पेस्ट और पेलेग्रजिम नारीवादी चिंतकों को लव जिहाद में स्त्री विमर्श पर बोलने का मौका कभी नहीं मिलता है।

भारतीय फेमिनिस्ट के इस अनदेखेपन से क्या हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि भारत का स्त्री विमर्श वामपंथी है? या फिर भारत के नारीवादी विमर्शों को पिंजड तोड़ जैसे समूहों ने कब्ज़ा कर लिया है जो कि शाहीन बाग़ में अराजकता फ़ैलाने के विमर्शों में व्यस्त हो गए हैं? क्या भारत के फिमेनिस्ट खुद को हिंदू धार्मिक मान्यताओं की ऐसी आत्ममुग्ध आलोचनाओं में व्यस्त रखना चाहती हैं जो कि अब या तो मिथकों का हिस्सा हो गया है या फिर यूरोपीय और अमेरिकी संस्थानों से फेमिनिस्ट स्टडी के नाम पर मिलने वाले भरी-भरकम रकम प्राप्त करने का खिलौना बन कर रह गया है?

उपरोक्त प्रश्नों का समाधान क्या है?

वस्तुतः फेमिनिज्म डिबेट पुरुषों के द्वारा अस्तित्व में लाया गया विमर्श है। पुरुष प्रधान देशों में स्त्रियों के हक की बात मुख्यत: लिबरल पुरुष ही उठाते रहे हैं। हालाँकि फेमिनिज्म का विमर्श पुरुषों ने उठाया जरूर, लेकिन इसकी व्यापक स्थापना में स्त्रियों का अमूल्य योगदान रहा है। भारत के लव जिहाद के मामले को भी मुख्यत: हिंदू पुरुष ही उठाते हैं।

केरल में भी लव जिहाद के खिलाफ आवाज ईसाई पुरुष पादरियों ने ही उठाया है। लेकिन हिंदू स्त्री या ईसाई स्त्रियों के मजहबी उत्पीड़न की बात क्या सिर्फ पुरुष ही उठाते रहेंगे? हिंदू स्त्री, लव जिहाद के नाम पर अपने मानवीय अधिकार के नाम पर कब जागरूक होंगी?

इसलिए आज जबकि भारत का नारीवाद भटका हुआ रेडिकल वामपंथी है, इस स्थिति में आज हिंदू फेमिनिज्म (Hindu feminism) विमर्श की सख्त आवयशकता है। हिंदू महिलाएँ जो लेफ्ट की शिकार हैं, उन्होंने लव जिहाद से पीड़ित लाखों हिंदू और ईसाई महिलाओं की पीड़ा समझने और उसे डिबेट में लाने में अक्षम हैं।

यह नॉलेज गैप सिर्फ हिंदू फेमिनिज्म के नए विमर्शों से ही भर पाएगा। हिंदू और ईसाई महिलाओं को आगे आकर फेमेनिज्म के इस नए विमर्श को अपने कँधे पर उठाना पड़ेगा। नहीं तो प्रिया चौधरी, हिना तलरेजा, निमिषा, प्रज्ञा देवनाथ सहित अन्य लाखों लड़कियाँ सेक्स स्लेव, हत्या, बलात्कार और अवसाद का शिकार हो कर दम तोड़ती रहेंगी। परिणामस्वरूप भारत का समाज अपना मूल स्वरुप खोकर इतिहास के पन्नों में सिमट जाएगा।

बंगाल में जिस 16 साल की लड़की के रेप को पुलिस ने कहा हत्या, अब उसी के पिता और 2 भाइयों को किया अरेस्ट

भारतीय जनता पार्टी ने आरोप लगाया था कि तृणमूल कॉन्ग्रेस के कार्यकर्ताओं ने पीड़िता का बलात्कार किया और फिर हत्या कर दी गई, क्योंकि पीड़िता का परिवार भारतीय जनता पार्टी का समर्थक है। आरोपित फिरोज अली सत्ताधारी तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) से जुड़ा बताया जा रहा है।


पश्चिम बंगाल के उत्तरी दिनाजपुर में एक भाजपा नेता की नाबालिग बहन के साथ कथित तौर पर रेप के बाद हत्या के मामले में आरोपित व्यक्ति फिरोज अली की भी एक दिन बाद हत्या हो जाने के आरोप में पुलिस ने पीड़िता के पिता और दो भाइयों को गिरफ्तार कर लिया है।

बता दें कि यह गिरफ्तारी आरोपित की लाश मिलने के एक दिन बाद हुई है। जानकारी के मुताबिक पीड़िता के पिता ने अपनी शिकायत में जिस आरोपित का नाम दिया था, उसका शव सोमवार (जुलाई 20, 2020) को सोनारपुर इलाके के एक तालाब में मिली है। आरोपित युवक के परिवार ने पुलिस शिकायत में कहा है कि उसकी हत्या पीड़िता के परिवार ने की थी।

भारतीय जनता पार्टी ने आरोप लगाया था कि तृणमूल कॉन्ग्रेस के कार्यकर्ताओं ने पीड़िता का बलात्कार किया और फिर हत्या कर दी गई, क्योंकि पीड़िता का परिवार भारतीय जनता पार्टी का समर्थक है। आरोपित फिरोज अली सत्ताधारी तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) से जुड़ा बताया जा रहा है।

लड़की और युवक के अलग-अलग धार्मिक समुदायों से होने के बाद इलाके में तनाव बरकरार है। पीड़िता और आरोपित युवक एक ही गाँव में रहते थे और पुलिस जाँच कर रही है कि क्या दोनों के बीच संबंध थे और क्या उनके माता-पिता इसके विरोध में थे।

इस्लामपुर जिले के पुलिस अधीक्षक सचिन मक्कड़ ने कहा, “हमने युवक के पिता की शिकायत के आधार पर लड़की के पिता और दो भाइयों को गिरफ्तार किया है।”

इसके अलावा पुलिस ने रविवार को आगजनी और झड़प के सिलसिले में 22 लोगों को गिरफ्तार किया है जिसमें पुलिस वैन और सरकारी बसों को भी आग लगा दी गई थी।

भाजपा उत्तर दिनाजपुर जिला इकाई के उपाध्यक्ष सुरजीत सेन ने कहा, “सरकार और पुलिस ने युवाओं और लड़की के बीच संबंध के बारे में मनगढ़ंत कहानी बनाई है।”

पुलिस ने भाजपा के वरिष्ठ नेताओं की एक टीम को सोमवार को गाँव का दौरा करने से रोक दिया लेकिन बंगाल के पर्यटन मंत्री गौतम देब ने लड़की के परिवार से मुलाकात की।

युवक के चाचा ने आरोप लगाया कि उनके भतीजे की हत्या रविवार रात लड़की के परिवार ने की थी। उन्होंने आरोप लगाया कि दोनों युवकों और लड़कियों को मार दिया गया है।

युवक की माँ ने कहा, “किसी ने रविवार रात 11 बजे मेरे बेटे को फोन पर बुलाया और वह घर से चला गया। बाद में उसने फोन किया और कहा कि वह तीन लोगों के साथ है और जल्द ही वापस आएगा। हमने उसे फिर कभी नहीं सुना।”

पश्चिम बंगाल पुलिस ने सोमवार को ट्विटर पर लिखा, “पुलिस दोनों मामलों की जाँच कर रही है और घटना के सभी संभावित पहलुओं पर गौर कर रही है, जिसमें सामाजिक अस्थिरता, माता-पिता का दबाव और वास्तविक घटना से ध्यान भटकाने और छिपाने में कुछ लोगों द्वारा निभाई गई भूमिका शामिल है।”

लड़की के पिता ने आरोप लगाया था कि उसकी बेटी को युवक द्वारा नियमित रूप से परेशान किया जाता था और उसी ने बलात्कार किया और फिर उसकी हत्या कर दी।

गौरतलब है कि भाजपा नेता की बहन को 19 जुलाई को कथित रूप से घर से अगवा किया गया था। इसके बाद उसकी तलाश की गई तो वो बेहोशी की अवस्था में मिली। उसे तुरंत स्थानीय प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया। जब वहाँ पर उसकी हालत में सुधार नहीं आया तो फिर उसे इस्लामपुर सब-डिविजनल अस्पताल ले जाया गया। जहाँ उसने दम तोड़ दिया। बच्ची की मौत के बाद कई जगह इस मामले पर प्रदर्शन भी हुए। पुलिस ने मामला गर्माने के बाद पोस्टमार्टम का हवाला दिया।

पुलिस ने कहा कि रिपोर्ट में कहीं भी यौन उत्पीड़न की कोशिश या चोट का जिक्र नहीं है। बच्ची की मौत अधिक मात्रा में जहर पीने की वजह से हुई है। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में लड़की के शरीर पर कहीं भी खरोच के निशान नहीं हैं।

अब यह मामला महिला राष्ट्रीय आयोग तक पहुँच गया है। महिला आयोग की अध्यक्ष रेखा शर्मा ने इस मामले को अपने ट्विटर पर शेयर किया है। उन्होंने राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग का ध्यान आकर्षित करवाते हुए इस पर जल्द कार्रवाई की माँग की है।


सोहिब, इसराइल ने महादलित बुजुर्ग को मार डाला, शव जलाने नहीं दिया तो दरवाजे पर ही दफनाना पड़ा, बेटी को नग्न किया: परिवार का आरोप

संतोष कुमार ने इस दौरान सबसे बड़ा आरोप ये लगाया कि आरोपितों और उनके सहयोगियों ने उनके पिता का हिन्दू रीति-रिवाज से अंतिम संस्कार नहीं होने दिया, जिसके बाद उन्हें अपने दरवाजे के पास ही लाश को दफनाना पड़ा। उन्होंने आरोप लगाया कि चूँकि श्मशान तक जाने का रास्ता उनकी बस्तियों से होकर ही जाता है, इसीलिए उन्हें जलाने के लिए नहीं ले जाने दिया गया।


बिहार के पूर्णिया में एक महादलित व्यक्ति की हत्या का मामला सामने आया है। ये घटना डगरुआ थाना क्षेत्र स्थित दुबैली गाँव की है। विश्व हिन्दू परिषद ने इस मामले में न्याय की माँग की है। विहिप का कहना है कि सर्वलाल हरिजन (सर्वलाल माँझी) की न सिर्फ हत्या की गई बल्कि उनके घर पर भी हमला किया गया और उनके परिवार पर अत्याचार किया गया। विहिप के जिलाध्यक्ष पवन कुमार पोद्दार एवं जिला मंत्री रवि भूषण झा ने इस घटना से मीडिया को अवगत कराया।

दबंगों ने सर्वलाल हरिजन को मार डाला: विहिप का आरोप

विहिप के पदाधिकारियों ने बताया कि जून 2, 2020 को सर्वलाल हरिजन का सूअर गाँव के ही एक दबंग की बाँसवाड़ी में चला गया था, जिसके बाद वो लोग उग्र हो गए। इसके बाद दबंग व्यक्ति के परिवार के लोगों ने सहयोगियों के साथ मिल कर सर्वलाल हरिजन के घर पर हमला कर दिया और उन्हें अधमरा कर दिया। उनके घर में लूटपाट की गई और फिर आग लगा दिया गया। परिवार पर भी जानलेवा हमले किए जाने की बात सामने आई है।

विहिप के पदाधिकारी द्वय ने आरोप लगाया कि पीड़ित परिवार की महिलाओं पर भी आपत्तिजनक टिप्पणी की गई और उनके साथ भी आरोपितों ने अभद्र व्यवहार किया। घटना के बाद सभी घायलों को इलाज के लिए पूर्णिया सदर अस्पताल में भर्ती कराया गया। सर्वलाल हरिजन की स्थिति गंभीर देख उन्हें कुछ दिनों बाद बेहतर इलाज के लिए कटिहार मेडिकल कॉलेज में दाखिल कराया गया। 10 दिनों तक इलाज के बाद 5 जुलाई को उनकी मृत्यु हो गई।

विहिप ने पुलिस पर भी कुछ गंभीर आरोप लगाए हैं। संगठन का कहना है कि पुलिस-प्रशासन ने दोषियों को पकड़ने की बजाए मृतक सर्वलाल हरिजन के परिवार पर ही धारा 307 (हत्या का प्रयास) लगा कर मुकदमा दर्ज कर दिया है। मृतक की पुत्री ने बाद में हरिजन थाना पूर्णिया में मुकदमा संख्या 32/ 2020 दर्ज करवाया है। विहिप का आरोप है कि पूर्णिया हरिजन थाना के पर्यवेक्षाओं ने अभी तक घटनास्थल का दौरा नहीं किया है

ऑपइंडिया से बोले विहिप जिलाध्यक्ष पवन कुमार पोद्दार

विहिप और बजरंग दल ने भी पुलिस से माँग की है कि इस मामले में आरोपितों पर कड़ी कार्रवाई की जाए। ऑपइंडिया ने पूर्णिया में विहिप के जिलाध्यक्ष पवन कुमार पोद्दार से बातचीत की, जो पीड़त परिवार को न्याय दिलाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं और जिन्होंने इस पूरी घटना को शुरू से अंत तक देखा-समझा है। उन्होंने बताया कि दुबैली पंचायत में मात्र 15 हिन्दू परिवार हैं और 500 से भी अधिक मुस्लिम घर हैं।

वहाँ जो भी मुट्ठी भर हिन्दू लोग हैं, वो महादलित हैं। पीड़ित परिवार भी इसी समुदाय से आते है, जो ‘हरिजन’ सरनेम लगाते हैं। ये लोग पशुपालन कर के अपना गुजर-बसर करते हैं और सूअर भी पालते हैं। 2 जून को असल में हुआ क्या था? इसके जवाब में उन्होंने ऑपइंडिया को बताया कि उस दिन सर्वलाल हरिजन के सूअर का एक बच्चा मोहम्मद सोहिब (पिता- दाऊद) के बाँसवाड़ी में चला गया था।

इसके बाद मोहम्मद सोहिब और उसके परिवार के लोगों ने सूअर के उस बच्चे को जान-बुझ कर मार डाला। उसे मारने के लिए पत्थर का इस्तेमाल किया गया। पोद्दार ने आगे बताया कि जब सूअर के बच्चे को मार डाला गया तो सर्वलाल हरिजन के परिजन सोहिब के यहाँ पहुँचे और पूछा कि उनके पशु को क्यों मारा? इसपर आरोपित और उसका परिवार महादलितों को ही भला-बुरा कहने लगा और पूछा कि अपने पशु को बाँध कर क्यों नहीं रखा?

महादलित बुजुर्ग की मौत पर स्थानीय मीडिया की रिपोर्ट


आगे वाद-विवाद बढ़ाते हुए उनलोगों ने कहा कि तुम्हें भी मारेंगे। पवन कुमार पोद्दार ने बताया कि सोहिब ने मुस्लिम भीड़ के साथ पीड़ित परिवार को घर तक खदेड़ दिया और वहाँ परिवार के सभी सदस्यों को मारा। इसके बाद घर में आग लगा दी गई। उन्होंने बताया कि चूँकि पीड़ित परिवार के घर के आसपास मुस्लिमों के ही घर हैं, इसीलिए इन्हें निकलने भी नहीं दिया गया। पीड़ितों को थाने भी नहीं पहुँचने दिया गया।

बाद में पीड़ितों ने फोन कर के डगरुआ थाना पुलिस को सूचित किया। घटना के 2 घंटे बाद पुलिस पहुँची। पुलिस ने ही सारे पीड़ितों को अस्पताल पहुँचाया। बाकी पीड़ित तो ठीक हो गए लेकिन सर्वलाल हरिजन के हाथ और छाती में चोट लगने के कारण कटिहार मेडिकल कॉलेज रेफर कर दिया गया। वहाँ कम से कम 10 दिन उनका इलाज हुआ लेकिन कोई फायदा नहीं हो पाया और उनकी स्थिति बिगड़ती चली गई।

पोद्दार आगे बताते हैं कि इसके बाद परिजनों ने सर्वलाल हरिजन को लेकर पूर्णिया के किसी प्राइवेट नर्सिंग होम में भर्ती कराना उचित समझा। प्राइवेट नर्सिंग होम में भी डॉक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए और दिल्ली ले जाने को कहा। चूँकि, डॉक्टरों ने 2 लाख रुपए के खर्चे के अनुमान लगाया था और गरीब परिवार के पास इतने रुपए थे नहीं, वो सर्वलाल हरिजन को लेकर घर आ गए। उन्होंने रुपए जुटाने चाहे तो 30-40 हजार से अधिक नहीं जमा हुए।

विहिप के पूर्णिया जिलाध्यक्ष पवन कुमार पोद्दार ने बताया कि घर लाए जाने के 2 दिन बाद सर्वलाल की मृत्यु हो गई। इसके बाद सूचना मिलते ही पुलिस आई, जिसने शव का पोस्टमॉर्टम कराया। पोस्टमॉर्टम की प्रक्रिया पूरी करने के बाद शव को पीड़ित परिजनों को सौंप दिया गया। उन्होंने बताया कि अब तक SC-ST थाने ने निरीक्षण नहीं किया है। वो लोग पुलिस की आगे की कार्रवाई का इन्तजार कर रहे हैं।

क्या कहते हैं सर्वलाल हरिजन के परिजन

ऑपइंडिया ने मृतक के पुत्र संतोष कुमार से संपर्क किया, जिन्होंने पवन कुमार पोद्दार द्वारा लगाए गए आरोपों की पुष्टि करते हुए कहा कि आज भी मुस्लिम युवक रात में नकाब पहन कर उनके परिवार पर निगरानी रख रहे हैं ताकि वो लोग कुछ कर न पाएँ। साथ ही लम्बे समय से मुस्लिम समाज के लोगों पर डराने-धमकाने का आरोप भी लगाया। उन्होंने बताया कि विकास कार्यों में भी मुस्लिम जनप्रतिनिधि भेदभाव करते हैं।


संतोष कुमार ने इस दौरान सबसे बड़ा आरोप ये लगाया कि आरोपितों और उनके सहयोगियों ने उनके पिता का हिन्दू रीति-रिवाज से अंतिम संस्कार नहीं होने दिया, जिसके बाद उन्हें अपने दरवाजे के पास ही लाश को दफनाना पड़ा। उन्होंने आरोप लगाया कि चूँकि श्मशान तक जाने का रास्ता उनकी बस्तियों से होकर ही जाता है, इसीलिए उन्हें जलाने के लिए नहीं ले जाने दिया गया। इसलिए दफनाना पड़ा

संतोष ने बताया कि यहाँ ऊँची आवाज़ में गाना-बजाना होने पर भी मुस्लिम समाज के लोग आपत्ति जताते हैं, अंतिम यात्रा तो दूर की बात है। उन्होंने आरोप लगाया कि गाँव में उनके घर के सामने से सड़क भी नहीं बनवाई गई है। संतोष ने आगे आरोप लगाया कि 5 साल पहले उनलोगों के साथ ही हुई मारपीट में उनकी भाभी की भी मौत हो गई थी। वो अभी भी प्रशासन से न्याय की उम्मीद लिए बैठे हैं।

क्या कहना है पुलिस का?

ऑपइंडिया ने इस दौरान स्थानीय पूर्णिया मुख्यालय के डीएसपी पंकज कुमार से संपर्क किया। हमारी बातचीत उनके रीडर शंकर से हुई, जिन्होंने पुलिस का पक्ष हमारे सामने रखा। उन्होंने पुलिस द्वारा घटनास्थल का दौरा न करने के आरोपों को नकार दिया और कहा कि पुलिस ने मामले की जाँच की है और चूँकि सर्वलाल हरिजन की मौत की सूचना इस घटना के महीने भर बाद मिली है, पुलिस फिर से जाकर जाँच करेगी।

उन्होंने बताया कि राजकुमारी देवी नामक महिला ने एससी-एसटी थाने में केस दर्ज कराया है। वो सर्वलाल हरिजन की बेटी है। उन्होंने बताया कि पीड़ितों ने पुलिस में शिकायत की है कि आरोपितों द्वारा मारपीट और गाली-गलौज किया गया है लेकिन तब मौत की बात नहीं कही गई थी। इसीलिए, पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के बाद आने वाली ‘मृत्यु समीक्षा रिपोर्ट’ का अध्यन करने के बाद ही आगे की कार्रवाई की जाएगी।

उन्होंने कहा कि जब तक रिपोर्ट नहीं आएगी, तब तक ये नहीं पता चल सकता है कि उनकी मौत इसी घटना के कारण हुई है या फिर उन्हें किसी प्रकार की बीमारी थी। उन्होंने इस बात से भी इनकार किया कि पुलिस ने उनका केस दर्ज करने में आनाकानी की। तब हत्या का मामला दर्ज नहीं हुआ था क्योंकि तब तक पीड़ित की मौत नहीं हुई थी। उन्होंने बताया कि तबियत खराब रहने के बावजूद डीएसपी ने जाँच की है। पुलिस फिर जाएगी।

ऑपइंडिया के पास सर्वलाल हरिजन की ‘मृत्यु समीक्षा रिपोर्ट’ है, जिसमें उनका नाम ‘सरब लाल मांझी’ अंकित है। इसमें बताया गया है कि उनके शव को उनके घर के बरामदे पर जुलाई 6, 2020 को शाम 7:30 बजे पाया गया। ऊपर संलग्न की गई रिपोर्ट में आप आरक्षी अधिकारी का हस्ताक्षर भी देख सकते हैं। इसमें बताया गया है कि उनका पिछले 1 महीने से विभिन्न अस्पतालों में इलाज चल रहा था, अंत में रजा अस्पताल में मृत्यु हो गई।

इस रिपोर्ट में उन्हें अंदरूनी चोट लगने की बात स्वीकार की गई है। मृत्यु का समय रात 11 बजे बताया गया है। उनकी उम्र 65 वर्ष थी। पुलिस पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट का अध्ययन करने के बाद जाँच को आगे बढ़ाएगी। रीडर शंकर ने बताया कि पुलिस की टीम जब घटनास्थल पर गई थी तब लोगों से ठीक से बातचीत नहीं हो सकी थी, इसलिए इस दिशा में फिर से प्रयास किया जाएगा। पीड़ितों की बातें सुनी जाएगी।

सर्वलाल हरिजन पक्ष की एफआईआर में क्या है?

संतोष कुमार ने हरिजन पक्ष की ओर से एफआईआर दर्ज कराई है, जिसमें बताया गया है कि जो सूअर का बच्चा मुस्लिम पक्ष की खेत में गया था, वो उनकी बहन का था। इसमें मोहम्मद मिंटू और मोहम्मद इजराइल सहित 14 लोगों को आरोपित बनाया गया है। लिखा है कि जब उनकी बहन राजकुमारी देवी ने जब पूछा कि उनके बच्चे को क्यों मारा गया था दूसरे पक्ष द्वारा उन्हें भी जान से मार डालने की धमकी दी गई और साथ ही पकड़ कर छेड़छाड़ किया जाने लगा।

एफआईआर के अनुसार, संतोष की बहन को पकड़ कर अर्धनग्न भी कर दिया गया। इसमें तहसीन, अशफाक, राशिद और सोहिब सहित कुल 14 को आरोपित बनाया गया है। इन सब पर लाठी-डंडे और बाँस से वार करने का आरोप लगाया गया है। सोहिब पर आरोप लगाया गया है कि उसने संतोष के पिता सर्वलाल को अंदरूनी चोट पहुँचा कर जख्मी कर दिया। साथ ही पत्थर चलाने का भी आरोप है।

इसके अलावा एक अन्य एफआईआर राजकुमारी देवी ने एससी-एसटी थाने में भी दर्ज कराई है, जिसमें मोहम्मद मिंटू और मोहम्मद नाजिम पर सूअर के बच्चे को मार डालने का आरोप लगाया गया है। आरोप लगाया गया है कि उन्होंने गाली देते हुए राजकुमारी देवी के लिए आपत्तिजनक जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल करते हुए ‘डोमिन’ कहा और मार डालने की धमकी दी, साथ ही साड़ी-ब्लाउज खींच कर नग्न कर दिया।

पूर्णिया एससी-एसटी थाना एफआईआर केस नंबर 32/20 में सर्वलाल हरिजन की बेटी राजकुमारी देवी ने आरोप लगाया है कि जब उनके रोने-चिल्लाने पर उनके परिजन दौड़े आए तो मुस्लिम पक्ष ने भी अपने सहयोगियों और परिजनों को हथियारों के साथ बुला लिया और फिर मारपीट कर के घायल कर दिया। उन्होंने अपने पिता को घायल किए जाने की बात कही। (चूँकि पिता की मौत 1 महीने बाद हुई, इसीलिए ये एफआईआर में दर्ज नहीं है।)

मुस्लिम पक्ष की FIR में क्या है?

मुस्लिम पक्ष की तरफ से मोहम्मद सोहिब ने थाने में एफआईआर दर्ज कराई है। इसमें सर्वलाल माँझी सहित 13 लोगों को आरोपित बनाया गया है, जिनमें महिलाएँ भी शामिल हैं। ऑपइंडिया ने आरोपित मोहम्मद सोहिब से भी संपर्क करने का प्रयास किया लेकिन उनकी तरफ से किसी से बात नहीं हो पाई है। उस पक्ष से जैसे ही किसी से संपर्क होता है, हम इस रिपोर्ट को अपडेट कर आपको अवगत कराएँगे।

उसने आरोप लगाया है कि जब उसके दोनों भाई जा रहे थे तो आरोपितों ने रोक कर धक्का-मुक्की किया और गाली-गलौज किया। मुस्लिम पक्ष ने हरिजन पक्ष के एक व्यक्ति पर लोहे के रॉड से वार करने का आरोप लगाया है और साथ ही उन सब पर महिलाओं के साथ बुरा बर्ताव करने का आरोप भी लगाया है। सोहिब ने लिखा है कि संतोष माँझी ने डंडे से उसकी फुआ को मारा, जिससे वो बेहोश हो गई।

मुस्लिम पक्ष का आरोप है कि हरिजनों ने उनके साथ लूटपाट भी की और जान से मारने की धमकी दी। मोहम्मद सोहिब के पॉकेट से 5000 रुपए लूट लेने की बात भी एफआईआर कॉपी में दर्ज है। बताया गया है कि सर्वलाल माँझी डीलर हैं और जब से उनकी जन-वितरण प्रणाली की अनुज्ञप्ति रद्द हुई है, तब से वो बौखलाए हुए हैं। इस एफआईआर कॉपी में हरिजनों पर तलवार से वार करने का आरोप भी लगाया गया है।



BJP विधायक के ऊपर बम से हमला, TMC के गुंडो ने की पार्टी ऑफिस में तोड़फोड़



"मुझे पता चला कि मेरे पार्टी कार्यालय में तोड़फोड़ की जा रही है, जब मैं वहाँ पहुँचा तो मैंने देखा कि एक लड़का मेरे ऑफिस को TMC के झंडे वाले रंग से रंग रहा था।"

पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा का दौर थमने का नाम नहीं ले रहा है। तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के गुंडे आए दिन हिंसात्मक घटनाओं को अंजाम देते रहते हैं। ऐसा ही एक मामला उत्तर 24 परगना का है, जहाँ बीजेपी के भाटपारा विधायक पवन सिंह ने आरोप लगाया कि उनके पार्टी कार्यालय में तोड़फोड़ की गई और TMC के लोगों द्वारा उन पर बम से हमला किया गया।

उन्होंने कहा, “मुझे पता चला कि मेरे पार्टी कार्यालय में तोड़फोड़ की जा रही है, जब मैं वहाँ पहुँचा तो मैंने देखा कि एक लड़का मेरे ऑफिस को TMC के झंडे वाले रंग से रंग रहा था।”


पश्चिम बंगाल में बीजेपी सदस्यों को तंग करने और उनकी हत्या करने का सिलसिला कोई नया नहीं है। राज्य के विद्युत मंत्री सोवनदेब चट्टोपाध्याय ने अपनी ही पार्टी की सांसद माला रॉय के समर्थकों पर मारपीट का आरोप लगाया था। उनका कहना था कि उन पर यह हमला दक्षिण कोलकाता में एक कार्यक्रम के दौरान किया गया।

इसके अलावा, अक्टूबर महीनें में राज्य के बीरभूम में TMC गुंडों ने 47 वर्षीय महिला बीजेपी कार्यकर्ता शंकरी बागड़ी की गोली मारकर हत्या कर दी थी। वहीं, छ: अन्य बीजेपी समर्थक गंभीर रूप से घायल हो गए थे। बताया गया था कि TMC के गुंडों ने बंदूकों और हथियार के साथ शंकरी बागड़ी के घर को पूरी तरह से घेर लिया था। उसके बाद TMC कार्यकर्ताओं द्वारा शुरू की गई गोलीबारी में इस हिंसात्मक घटना को अंजाम दिया गया।   

बता दें कि पश्चिम बंगाल में सूबे की सरकार और राज्यपाल के बीच भी तीखी नोंक-झोंक देखने को मिलती रहती है। राज्यपाल जगदीर धनखड़ ने हाल ही में एक ट्वीट के ज़रिए ममता बनर्जी पर निशाना साधा था। उन्होंने अपने ट्वीट में लिखा कि दीदी ने उनके बारे में ‘तू चीज बड़ी है मस्त-मस्त’ कहा है। इस बात की पुष्टि के लिए राज्यपाल धनखड़ ने एक बंगाली अख़बार की ख़बर की तस्वीर भी शेयर की थी।


बंगाल: BJP नेता की नाबालिग बहन की रेप के बाद हत्या, TMC के फिरोज अली पर अगवा कर घटना को अंजाम देने का आरोप

चोपरा में 16 वर्षीय एक लड़की का फिरोज अली नाम के एक शख्स ने रेप किया। उसकी आज सुबह मौत हो गई। क्या उसने स्थानीय भाजपा बूथ अध्यक्ष की बहन होने की कीमत चुकाई? और दुख की बात है कि एक महिला मुख्यमंत्री द्वारा शासित राज्य लड़कियों की सुरक्षा नहीं कर सकता।"



पश्चिम बंगाल में एक बीजेपी नेता की 16 वर्षीय बहन को अगवा कर रेप करने और हत्या का मामला सामने आया है। घटना उत्तर दिनाजपुर के चोपरागज की है। आरोपित फिरोज अली सत्ताधारी तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) से जुड़ा बताया जा रहा है।

उत्तर दिनाजपुर में भाजपा के बूथ अध्यक्ष की बहन को उसके घर से कथित रूप से अगवा किया गया। रविवार (जुलाई 19, 2020) सुबह उसकी अस्पताल में मौत हो गई।

इस घटना के विरोध में, भाजपा कार्यकर्ताओं और समर्थकों ने उत्तर दिनाजपुर के चोपरागज के कालागढ़ में राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 31 पर टायर जलाकर सड़क को अवरुद्ध कर दिया।

मामले में बीजेपी बंगाल ने अपने ट्विटर हैंडल पर लिखा, “चोपरा में 16 वर्षीय एक लड़की का फिरोज अली नाम के एक शख्स ने रेप किया। उसकी आज सुबह मौत हो गई। क्या उसने स्थानीय भाजपा बूथ अध्यक्ष की बहन होने की कीमत चुकाई? और दुख की बात है कि एक महिला मुख्यमंत्री द्वारा शासित राज्य लड़कियों की सुरक्षा नहीं कर सकता।”

पीड़िता के परिजनों के मुताबिक भाजपा बूथ अध्यक्ष की बहन रविवार सुबह अपने घर के बगल में शौच के लिए गई थी। उसी समय उपद्रवियों ने कथित तौर पर उसका अपहरण कर लिया।

इसके बाद पीड़िता को सोनारपुर ग्राम पंचायत में चोपरा के पास एक खाली जगह पर ले जाया गया और वहाँ उसके साथ बलात्कार किया गया। फिर बदमाश लड़की को वहीं छोड़कर फरार हो गए। बाद में आरोपितों पर पीड़िता को जहर देकर मारने का प्रयास करने का भी आरोप लगाया गया।

जानकारी के मुताबिक जब लड़की की तलाश की गई तो वो बेहोशी की अवस्था में मिली। उसे तुरंत स्थानीय प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया। जब वहाँ पर उसकी हालत में सुधार नहीं आया तो फिर उसे इस्लामपुर सब-डिविजनल अस्पताल ले जाया गया। हालाँकि वहाँ पर इलाज के दौरान पीड़िता की मौत हो गई।

उत्तर दिनाजपुर जिला भाजपा ने इस घटना के लिए तृणमूल कॉन्ग्रेस को जिम्मेदार ठहराया है। उत्तर दिनाजपुर जिले के भाजपा महासचिव सुरजीत सेन ने कहा, “तृणमूल ने ऐसा किया है।” भाजपा कार्यकर्ताओं ने आरोपियों की गिरफ्तारी की माँग को लेकर राष्ट्रीय राजमार्ग 31 पर टायर में आग लगा दी। बाद में भारी पुलिस बल गया और स्थिति को नियंत्रण में लाया।

पुलिस ने मौके से एक पर्स, आधार कार्ड, मोबाइल फोन बरामद किया है। घटनास्थल से कुछ दूरी पर एक साइकिल भी मिली। इस संबंध में इस्लामपुर के पुलिस अधीक्षक सचिन मक्कड़ ने कहा, ”मैं जाँच कर रहा हूँ। दोषियों की तलाश जारी है।”


अयोध्या पर दिए बयान पर अपने ही घर में घिरे ओली, थापा बोले- भारत-नेपाल संबंधों को खराब करना चाहते हैं

ओली अपनी सत्ता को जाते हुए देख लगातार भारत पर निशाना साध रहे हैं। सोमवार को उन्होंने दावा किया कि भारत ने सांस्कृतिक अतिक्रमण के लिए नकली अयोध्या का निर्माण किया है। जबकि, असली अयोध्या नेपाल में है।


काठमांडू
नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने भगवान राम के जन्मस्थान को लेकर विवादित टिप्पणी की थी। इसके बाद ओली अपने ही घर पर घिर गए हैं। नेपाल के कई नेताओं ने खुलकर ओली के इस बयान का विरोध किया है। नेताओं ने कहा कि भारत और नेपाल के बीच वैसे भी तनाव की स्थिति बनी हुई है ऐसे में कोली को ऐसे दावों से बचना चाहिए।

ओली ने किया बेबुनियादी दावा
ओली अपनी सत्ता को जाते हुए देख लगातार भारत पर निशाना साध रहे हैं। सोमवार को उन्होंने दावा किया कि भारत ने सांस्कृतिक अतिक्रमण के लिए नकली अयोध्या का निर्माण किया है। जबकि, असली अयोध्या नेपाल में है। ओली पहले कह चुके हैं कि भारत उनको सत्ता से हटाने की साजिश रच रहा है। ओली ने सवाल किया कि उस समय आधुनिक परिवहन के साधन और मोबाइल फोन (संचार) नहीं था तो राम जनकपुर तक कैसे आए?

राष्ट्रीय प्रजातांत्री पार्टी के सह-अध्यक्ष कमल थापा ने कहा कि प्रधानमंत्री के लिए इस तरह के निराधार, अप्रमाणित बयानों से बचना चाहिए। थापा ने ट्वीट किया, "ऐसा लग रहा है कि पीएम तनावों को हल करने के बजाय नेपाल-भारत संबंधों को और खराब करना चाहते हैं।"

इसी तरह, राष्ट्रीय योजना आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष स्वर्णिम वागले ने चेतावनी दी कि भारतीय मीडिया कल पीएम के बयान से विवादास्पद सुर्खियां बटोर सकता है और बना सकता है।

काठमांडू
नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली अपनी सत्ता को जाते हुए देख लगातार भारत पर निशाना साध रहे हैं। सोमवार को उन्होंने दावा किया कि भारत ने सांस्कृतिक अतिक्रमण के लिए नकली अयोध्या का निर्माण किया है। जबकि, असली अयोध्या नेपाल में है। ओली पहले कह चुके हैं कि भारत उनको सत्ता से हटाने की साजिश रच रहा है। ओली ने सवाल किया कि उस समय आधुनिक परिवहन के साधन और मोबाइल फोन (संचार) नहीं था तो राम जनकपुर तक कैसे आए?

भारत की अयोध्या वास्तविक नहीं!
उन्होंने दावा किया कि लेकिन, हमने भारत में स्थित अयोध्या के राजकुमार को सीता नहीं दी। बल्कि नेपाल के अयोध्या के राजकुमार को दी थी। अयोध्या एक गांव हैं जो बीरगंज के थोड़ा पश्चिम में स्थित है। भारत में बनाया गया अयोध्या वास्तविक नहीं है।

ओली का तर्क-इतने दूर कैसे आ सकते हैं राम?
ओली ने तर्क दिया कि अगर भारत की अयोध्या वास्तविक है तो वहां से राजकुमार शादी के लिए जनकपुर कैसे आ सकते हैं। उन्होंने दावा किया कि विज्ञान और ज्ञान की उत्पत्ति और विकास नेपाल में हुआ।

केपी ओली के इस्तीफे की मांग तेज
नेपाल में कई दिनों से केपी ओली के इस्तीफे की मांग उठ रही है। बजट सत्र को स्थगित करने के बाद अब केपी ओली एक अध्यादेश लाकर पार्टी को तोड़ सकते हैं। सूत्रों से हमारे सहयोगी अखबार इकनॉमिक टाइम्स को जानकारी मिली है कि ओली वहां मुख्य विपक्षी पार्टी नेपाली कांग्रेस के संपर्क में हैं, जिनसे उन्हें सपॉर्ट मिल सके। दरअसल, ओली अध्यादेश लाकर पॉलिटिकल पार्टीज ऐक्ट में बदलाव कर सकते हैं। इससे उन्हें पार्टी को बांटने में आसानी होगी। यह सब चीन और पाकिस्तान के समर्थन से हो रहा है।

ओली को बचाने के लिए चीन-पाक सक्रिय
ओली भारत के खिलाफ बयानबाजी कर रहे हैं। इसके बाद ही पाकिस्तान पीएम इमरान खान ने ओली से संपर्क साधा था। दूसरी तरफ नेपाल में मौजूद चीनी राजदूत भी इसकी कोशिशों में लगे हैं कि ओली को सत्ता में बनाए रखा जा सके। हाल में ओली द्वारा उठाए गए कुछ कदमों के पीछे चीनी राजदूत का रोल अहम बताया जाता है। अगर पार्टी टूटती है तो ओली को अपने समर्थन में 138 सांसद दिखाने होंगे। लेकिन अध्यादेश के बाद उन्हें सिर्फ 30 प्रतिशत सांसद का सपॉर्ट दिखाना होगा। ऐसे में ओली के लिए चीजें आसान होंगी क्योंकि 40 प्रतिशत सांसद उनकी तरफ हैं।


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